मिलन एक पल का- मालिनी गौतम की कविताएँ


मालिनी गौतम                                                                   

मालिनी गौतम प्रिंट मीडिया में एक सुपरिचित नाम है। देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। डॉ. मालिनी गौतम की रचनाओं का धरातल नितांत मौलिक और नवता लिये हुए है। उनमें ज़िन्दगी की गरमाहट और संवेदना  का घनत्व पंक्ति दर पंक्ति दिखायी देता है। अपने समय और परिवेश के सच को शब्दों में उतारना उनकी रचनाधर्मिता का प्रथम लक्ष्य है। स्त्री-विमर्श के स्वर भी उनमें देखे जा सकते हैं, किन्तु वे वास्तविक हैं, किसी नारे का अनुगायन नहीं। वे चाहे गीत लिखें या ग़ज़ल अथवा छन्दमुक्त कविता, उनकी प्रतिबद्धता किसी वाद के प्रति न होकर अपने पाठकों के प्रति है और इसीलिये वे पाठकों को अपने से जुड़ी लगती हैं।



(1)

कटी पतंग

वह उड़ती रही दूर-दूर
तुम्हारी पतंग बनकर
जब कभी तुम ढ़ील देते
वह जा पहुँचती
ऊँचे खुले आसमान में
खुलकर हँसती
घूम आती
खेत-खलिहान,पर्वत,नदियाँ...
जैसे ही तुम
मंजा लपेटते
वह अनमनी सी
खिंची चली आती
धीरे-धीरे तुम्हारी ओर...
कभी-कभी
अपने शौक के लिये
तुम लगाते पेंच
और काटते रहते
दूसरों की पतंगे...
पर दूसरो की पतंग काटते-काटते
एक दिन कट गई
तुम्हारी ही पतंग...
तुम कुछ पल देखते रहे
उसे आसमान में
विलीन होते
फिर जुट गये एक और
नई पतंग को जोत बाँधने में
कटी हुई पतंग के
हश्र से बेहखबर
शायद वह गिरेगी
खेत में खड़े किसी बच्चे के
नन्हें हाथों में,
या हो जायेगी चिथड़े-चिथड़े
किसी ऊँचे दरख्त
या बिजली के तारों में फंसकर
अय खुदा.....
काश पतंग को भी
उसकी मरजी दी होती..
क्या जरूरी है
उसकी डोर
किसी और के हाथों में देना...? 
***


(2) 

मिलन एक पल का

 
 रात ने जाते-जाते
हौले से चूम लिये
सुबह के बंद नयन
धीरे से फैला दिया
मद्धिम सा प्रकाश
उसकी देह पर
सजा दी शबनम की लड़ियाँ
उसके गेसुओं में
ओस की कुछ बूँदें
आ कर ठहर गईं
सुबह के होठों पर
सूरज अपलक देखता रहा
कुछ देर इस अप्सरा को
जैसे ही सूरज की
पहली किरण ने
चूमें उसके होंठ
सुबह मचल कर छुप गई
कहीं बादलों के पीछे
इस एक पल के मिलन की
वेदना लिये
सूरज दिन भर
तपता रहा, जलता रहा,
और जलाता रहा सबको
 आखिर सांझ ने आकर
धीरे से थाम लिया उसका हाथ
लगा दिया चंदन लेप
  उसके दग्ध घावों पर
बन गई उसकी प्रियतमा
और छुपा लिया उसे
अपने सुनहरे आँचल में
पर इन सबसे बेखबर
सूरज तो नींद में भी
बदलता रहा करवटें
एक और सुबह के इंतजार में ...
***

(3)

उधार की ज़िंदगी




साँसों को जिन्दा रखने के लिये
वह हर रोज भरती है तेल
 मिट्टी के दीये में
पर अफसोस
कभी बाती जल कर
हो जाती है खाक
तो कभी दीया ही
चूस लेता है तेल को,
कभी हवा के थपेड़ो में
फक्क से बुझ जाती है लौ
और फैल जाता है
कसैला सा धुँआ चारो,
हर दिन आधी जली बाती फेंक कर
फिर से बनाती है
एक नई बाती
फिर से भरती है तेल
मिट्टी के दिये में
एक बार फिर कोशिश करती है
उखड़ती साँसों को बाँधने की
जैसे ही टिमटिमाती है लौ
हर रोज की तरह
आकर्षण में बँधे
खिंचे चले आते हैं
ढ़ेरो पतंगिये
कुछ देर मंडरा कर
कर देते हैं खुद को भस्म
 मिट्टी की तपिश में
और दे जाते हैं उसे
चंद साँसें उधार की
अगले दिन फिर से जलने के लिये….
***



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