Archive for 5/1/11 - 6/1/11

चंचला पाठक की कविताएँ

संक्षिप्त परिचयः
नाम : श्रीमती चंचला पाठक
जन्म : ९ फरवरी, १९७१
जन्मस्थान : गुरारू, जिला गया (बिहार)
शिक्षा : एम.ए. दर्शनशास्त्र, संस्कृत, बी.एड. पीएच.डी. शोधरत् (अथर्ववेद)
पेशा : शिक्षिका
अभिरुचि : लेखन

श्रीमती चंचला पाठक की काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर वरिष्ठ साहित्यकार श्री भवानी शंकर व्यास ‘विनोद’ ने कहा है ‘‘चंचला पाठक की सृजनधर्मिता, रचनात्मक बेचैनी, उसका कल्पना वैभव, निजता को सार्वभौमिकता से जोडने की उसकी ललक, शब्द-सम्पदा पर गज़ब का अधिकार, अछूते बिम्ब विधानों का रचाव आदि सब मिलकर आश्वस्त करते है कि यह कवयित्री भविष्य में एक अत्यन्त सफल रचनाकार के रूप में सामने आएगी।’’

हिन्दी, उर्दू, अवधी और संस्कृत भाषा पर समान अधिकार रखने वाली श्रीमती चंचला पाठक समकालीन काव्यधारा में अपना एक अलग फलक रखती हैं और पल-प्रतिपल जीवन की बुनावट में कविता तलाशती उनकी कल्पना कविता की जड में भी कविता के चटख रंगों का कोलाज बनाती है। प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएँ......
१.

मैं सृजन हूँ

आकार की नियति ही है-

समाहित हो जाना अन्यत्र।

कहाँ तक ढूँढोगे-

स्वयं की परिभाषा?

आओ, आलिंगन कर लो

मैं ही सृजन हूँ।

दृष्टि का आधार चक्षुष् हैं

प्रत्यक्ष करना ही श्रेय है।

असीम निर्विकल्प स्वयं को तुम

मुझ दर्पण में तो देखो

मैं भी सृजन हूँ।

सन्नाटे सिरजती गूढ़ तन्मयता

अनन्त का आलम्बन

फिर भी निर्भय अडिग मैं

संरक्षित! तुम्हारे ही अंतः मैं

क्योंकि, मैं तो सृजन हूँ।
**


२.

सौदा

गिद्ध को,

हृदय का संपूर्ण भाग

देना अभिशप्त था,

अविचल सत्य भी।

लेकिन,

वह देवात्मा नही

मानवी थी;

स्वभाववश,

बस अंश मात्र!

बचा कर

रखली;

सोचा,

देवात्मा उनके

श्री चरणों में

यह अंश

अर्पित करूँगी;

परन्तु गिद्ध की स्वीकृति से

सरल थी-

गिद्ध तो गिद्ध होता ही होता है

पर आश्चर्य!

गिद्ध ने स्वीकृति दे दी!

डसने कहा

‘‘ठीक है; लेकिन-

दोनो आँखें मुझे देते जाना!’’
**


३.

काश!

इंसान,

फिर भी भागता रहा

बदहवास!

घनाभूत, जंगली

और टेढे-मेढे रास्तों पर।

वहीं कहीं-

पसरती गई सासें

इन्हीं रास्तों के इर्द-गिर्द

फिर,

इन्हें झुठलाता हुआ सा

एक अहसास!

रेंगता रहा-

पल-पल के अंतस में।

बुझती-सी चेतना

चिढ़ती तन्मयता।

ठहरे से बोल

चीखती हुई ख़ामोशियाँ

साथ ही

ऊँघती हुई-सी

ज़िन्दगी।

काश!

इंसान ढूँढता

पगडण्डी के बीचों-बीच

नग्न बचपन के

कटोरे में पसरे

ब्रह्मांड के समान भूख का

खो जाना;

और, वहीं कहीं

किलकती

इक नन्ही सी मुस्कान।
**


४.

तुम स्पन्दित हो

कभी देखा है?

मौन में विलीन होते हुए

हृदय के स्पन्दन को?

शब्दों को कौन कहे? (!!)

परन्तु,

भ्रमित मत हो जाना

यहाँ व्यक्ति को ‘मृत’ की

संज्ञा से नहीं

बल्कि

किसी भी विस्मयात्मक शब्द की

संज्ञा से

अभिहित किया जाता है।

और

प्रायः प्रकृतिवश,

आश्चर्य के साथ।

दुःख का प्रकटन

क्षण-मात्र का होता है।

फिर हावी जो जाती है

वही प्रतिदिनात्मक दिनचर्या

और निष्ठुर सांसारिकता।

परन्तु

मैं आज भी उस स्पन्दन की

छुअन को

अपनी उँगलियों के पोरों पर लिए,

भटक रही हूँ

अनवरत

जाने क्यूँ

ऐसा लगता है,

बार-बार,

कि हौले से

कोई इन्हें

अपनी हथेलियों पर

उतार लेगा।

और,

फिर

पत्थरों की छाती में कैद,

मोम-सी स्निग्धता से-लबरेज

संवेगों का उछाह

इस स्पर्श की

गर्मास से

तरल हो,

आँखों के कोरों से,

निकल पडेगा!

चुपके से

निःशब्द!!

हाँ निकल पडेगा वह स्पन्दन

और,

आखिर तोड ही देगा

इस मौन के

कारागार को

फिर

सनेह की रिमझिम में

टप-टप-टप

की लय से

बोल पडेगा

सिसकियों के

सरगम के लय में ‘वह’

सुनो- ‘‘तुम भी स्पन्दित हो!’’
***
(काव्य संकलन 'खंडहरों की ओटों से...' से उद्धृत)

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संजय पुरोहित की लघुकथाएँ

संक्षिप्त परिचय:
नाम : संजय पुरोहित
जन्म : २१.१२.६९
शिक्षा : एम. कॉम. (व्या.प्रशासन), एम. ए. (अंग्रेजी साहित्य), पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक
प्रकाशन : मधुमती, ’पंजाब केसरी’, ’दैनिक भास्कर’, ’दैनिक युगपक्ष’ ’अग्रदूत’, युग तेवर, समीचीन, आदि समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में लघु कथाएँ, कहानियाँ प्रकाशित होती रही है। आप हिंदी, राजस्थानी और अंग्रेजी में लगातार लिखते रहे हैं तथा आपकी हिंदी कहानियो की एक पुस्तक 'कथांजलि' नाम से प्रकाशित हुई है. आपकी दूसरी पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य है
विशेष : आकाशवाणी बीकानेर से कहानियों, वार्ताओं का प्रसारण, स्थानीय टीवी कार्यक्रमों एवं वृत्तचित्रों के लिए आलेख लेखन कार्य।
संप्रति : कनिष्ठ लिपिक, जिला कलक्टर कार्यालय, बीकानेर
सम्पर्क : sanjaypurohit4u@yahoo.com

एडजस्टमेंट

“मैंने तो ब्रदर के साथ एडजस्टमेंट कर लिया है, छह महिने फादर मेरे पास रहते हैं और छह महिने ब्रदर के पास, डिस्प्यूट की कोई गुंजाईश ही नहीं’’ एक ने कहा।
’’देट्स गुड, वैसे तुम्हारे मदर नहीं है, इसलिए कोई प्रॉब्लम नहीं है, वैसे हम दोनों भाईयों ने तो डिसाईड किया कि जब चाहे फादर मेरे पास रहे, मदर उसके पास या मदर मेरे पास फादर उसके पास’’
दूसरे ने कहा ’’अरे तुम तो बोलो मिस्टर, बहुत बड़े आदमी बन गए हो, तुम्हारे मदर-फादर किसके पास रहते हैं ?’’ तीसरे के लिए प्रश्न आया।
“किसी के पास नहीं’’ तीसरे ने जवाब दिया।
“व्हॉट ? तो क्या वृद्धाश्रम में.........’’ उलझन में लिपटा प्रश्न उभरा।
“नहीं, नहीं, वो बात ऐसी है कि मेरे मदर-फादर किसी के पास नहीं रहते, बल्कि मैं अपने मदर-फादर के पास रहता हूँ।’’ फिर कोई प्रश्न नहीं आया।
***

जी.....!!

“बधाई हो, अब आप हमारे समधी हुए, आपकी बिटिया अब हमारी बहुरानी हुई, बधाई हो’’
“जी ! जी,, जी।’’
“मैं शीघ्र ही पण्डित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवाता हूँ’’
“जी’’
“देखिए! हमें ना तो कार चाहिए, ना मोटर साईकिल, ना फ्रिज़, न टीवी और नाही ही वॉशिंग मशीन, भगवान का दिया सब कुछ है हमारे पास।’’
“जी ! जी।’’
“मैं तो चाहूंगा कि आप इन सब के बदले कैश ही दे दें तो अच्छा रहेगा’’
“जी.............!!’’
***


संकल्प

आदतन अपराधी और हिस्ट्रीशीटर के दुखियारे पिता चल बसे। घर मे बैठक लगी। पंडितजी प्रतिदिन संध्या के समय गरुड़-पुराण सुनाते। एक दिन पंडितजी ने नचिकेता द्वारा देखे गये नर्क के वृतान्त को सुनाना शुरू किया। “अधर्मी, पापी और दूसरों को हानि पहुंचाने वाले दुष्टों को नर्क मे नाना प्रकार से यातना दी जा रही थी। किसी को कोड़े मारे जा रहे थे तो किसी को खौलते तेल में तला जा रहा था..आदि आदि। गरुड़ पुराण सुनते-सुनते मृतक पिता के आदतन अपराधी बेटे ने मन ही मन एक संकल्प लिया।
अगले दिन से गरुड़ पुराण बन्द कर दिया।
***

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ओम पुरोहित 'कागद' की दो कविताएँ

संक्षिप्त परिचय:
नाम:- ओम पुरोहित 'कागद'
जन्‍म:- ५ जुलाई १९५७, केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर)
शिक्षा:- एम.ए. (इतिहास), बी.एड. और राजस्थानी विशारद
प्रकाशित पुस्‍तकें:- हिन्दी :- धूप क्यों छेड़ती है (कविता संग्रह), मीठे बोलों की शब्दपरी (बाल कविता संग्रह), आदमी नहीं है (कवितासंग्रह), मरूधरा (सम्पादित विविधा), जंगल मत काटो (बाल नाटक), रंगो की दुनिया (बाल विविधा), सीता नहीं मानी (बाल कहानी), थिरकती है तृष्णा (कविता संग्रह)
राजस्थानी :- अन्तस री बळत (कविता संग्रै), कुचरणी (कविता संग्रै), सबद गळगळा (कविता संग्रै), बात तो ही, कुचरण्यां, पचलड़ी, आंख भर चितराम।
पुरस्कार और सम्‍मान:- राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘आदमी नहीं है’ पर ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की ओर से ‘बात तो ही’ पर काव्य विधा का गणेशी लाल व्यास पुरस्कार, भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा का कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार, जिला प्रशासन, हनुमानगढ़ की ओर से कई बार सम्मानित, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) की ओर सम्मानित।
विशेष:- साहित्य की सेवार्थ आप 'आखर कलश' के साथ 'सलाहकार संपादक' के रूप में भी अपनी अमूल्य सेवाएँ दे रहे हैं.
सम्प्रति:- प्रधानाध्यापक शिक्षा विभाग, राजस्थान
पता :- २४, दुर्गा कॉलोनी, हनुमानगढ़ संगम ३३५५१२ (राजस्थान)
ब्‍लॉग:- 'कागद' हो तो हर कोई बांचे

सड़क कभी नहीं बोलती

देहरी को लांघ
सड़क से सरोकार
यानी
असीम से साक्षात्कार ।

अंतहीन आशाएं
उगेरती सड़क
उकेरती अभिलाषाएं
पसर पसर आती हैँ
भटक भटक जाता है जीवन
कभी कभी
लौट भी नहीँ पाता
मुकम्मल सफ़र के बाद भी
कोई अधीर पथिक ।

सड़क चलती रहती है
आशाओँ
अभिलाषाओँ
आकांक्षाओँ को समेटती ।

बीच अधर मेँ
भले ही रुक जाए सफ़र
देह का
जीवन का सफ़र
नहीँ रुकता कभी भी ।

छूटती आशाएं
किसी और कांधे पर
आरूढ़ हो
फिर फिर से
निकलतीँ हैँ सफ़र पर
यूं कभी नहीँ होती खत्म
प्रतीक्षा किसी भी देहरी की
जो झांकती है शून्य मेँ
उसके मुंह के सामने
पसरी सड़क की देह पर
कि आए वह लौट कर
जो निकला है सफ़र पर
दे दस्तक सांझ ढले
लेकिन
सड़क नहीँ बोलती
कभी भी नहीँ बोलती ।
***

मन करता है

हम चाहे
कुछ करेँ या न करेँ
मन हमारा
कुछ न कुछ
ज़रूर करता रहता है !

हमनेँ वोट किया
बदले व्यवस्था
नहीँ बदली !
मन ने
बो दिए बीज
न हो सकने वाली
अदृश्य क्रांति के !

मन करता रहा
भूखे को भोजन
नंगे को कपड़ा
घरहीन को घर
मिल ही जाए
संसद ने नहीँ सुना
भोजन अवकाश के बाद
वह स्थगित हो गई
अनिश्चितकाल के लिए ।

मन बोला
पेट क्योँ है
हर किसी के
जब भोजन नहीँ है
सब के लिए ।
लोग नंगे क्योँ है
जबकि सरकारेँ
कपड़े के लिए नहीँ
बुनती है ताने-बाने
अपने बने रहने के लिए ।

मन ने पूछा
देश मेँ
बहुत से हैँ
चिड़िया घर
अज़ायब घर
डाक घर
मुर्दा घर
फिर क्योँ हैँ
बहुत से लोग बेघर
इतने बरसोँ से !

नहीं मिलता
कहीँ से भी
किसी भी सवाल का
कोई ज़वाब
फिर क्योँ है
मेरे पास
उत्तरविहीन
इतने सवाल ?

मन पूछता रहता है
सब के हाथ
लड़ने के लिए नहीँ
मिलाने के लिए भी है
फिर क्यों
कुछ हाथ निकलते है
रोटी और लड़ाई के लिए ।

मन भरमाता है
हाथोँ की अंगुलियां
जब हैँ
मुठ्ठियां बंनने
और तनने के लिए
तो फिर क्योँ
पसर जाते हैँ हाथ
उठ जाती है अंगुलियां
एक दूसरे की ओर !

मन करता है
मन न करे कुछ
तन करे
ताकि चल सके
तन कर आदम जाये !
***

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शशि पाधा की कविताएँ

अमेरिका में रह रही अग्रिम पंक्ति की कवयित्री, हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर शशि पाधा १९६८ में जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय की सर्वश्रेष्ठ महिला स्नातक रहीं हैं। इसके अतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ सितार वादन के लिये भी आप सम्मानित हो चुकीं हैं।
२००२ में अमेरिका जाने से पूर्व आप भारत में एक रेडियो कलाकार के रूप में कई नाटकों और विचार-गोष्ठियों में भी सम्मिलित रहीं हैं। आपकी रचनायें भी समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। अमेरिका में आप नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन से जुड़ गईं।
अब तक आपके दो काव्य-संकलन “पहली किरण” और “मानस-मन्थन” प्रकाशित हो चुके हैं और एक अन्य प्रकाशनाधीन है। पिछले पाँच वर्षों से आप विभिन्न जाल-पत्रिकाओं से भी प्रकाशित हो रहीं हैं। उन्होंने अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी एट चैपल हिल में हिंदी भाषा का अध्यापन कार्य किया है। न्यूयॉर्क में 2007 में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में भी हिस्सा लिया है। वे अंतर्राष्ट्रीय विश्व समिति तथा हिंदी न्यास संस्थाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भी जुड़ी हुई हैं।

(1)

अग्नि रेखा

कुछ तो कह के जातीं तुम ।

अनगिन प्रश्न उठे थे मन में
उत्तर रहे अधूरे
मरुथल में पदचिन्हों जैसे
स्वप्न हुए न पूरे ।

उलझी जिन रिश्तों की डोरी
थोड़ा तो सुलझातीं तुम ।
कुछ तो कह के जातीं तुम ।

किस दृढ़ता से लांघ ली तूने
संस्कारों की अग्नि रेखा
देहरी पर कुछ ठिठकी होंगी
छूटा क्या, क्या मुड़ के देखा ?

खुला झरोखा रखा बरसों
जाने को आ जातीं तुम।
कुछ तो कह के जातीं तुम ।

आकांक्षाओं का पर्वत ऊँचा
चढ़ते-चढ़ते सोचा क्या?
जिस आँचल की छाँह पली
उस आँचल का सोचा क्या?


ममता की उस गोदी का
मान तो रख के जातीं तुम ।
कुछ तो कह के जातीं तुम ।
कुछ तो....
***

(2)

अस्तित्व

कुछ नहीं हुआ..
उसके जन्म पर
न ढोल, न बधाई
न भेंट, न आरती
न पूजन, न रीत

कोई नहीं आया--
उसके आने पर
न दादी, न नानी
न मौसी, न मामी
भेज दी थी
एक अनमनी आशीष
एक ठंडी सांस, सब ने
क्योंकि..
वह थी अवाँछित, उपेक्षित
अपनी माँ की तीसरी बेटी

किन्तु वह....
है, वह थी, वह रहेगी
लड़ेगी हर आग से,
छल से, प्रताड़ना से
झूठे अनुबंधों से,
अनुचित प्रतिबंधों से
ढूँढ़ेगी वह..
अपना क्षितिज
अपना सूर्य, अपनी दिशाएँ
जिएगी वह..
हर युग में, हर काल में
हर परिस्थिति में, हर समाज में

यह लड़ाई केवल उसकी है !
***

(3)

ताप

मेरी पीड़ा का गहन ताप
तुम पल भर न सह पाओगे,
पलकों का किनारा टूटा तो,
तिनके सा बह जाओगे ।

माना तुम इक पर्वत से
अटल, अडिग बलवान हुए
क्षण भर के मेरे कंपन से
टूट-टूट गिर जाओगे ।

गहन अंधेरा हर सकने का
सूरज सा है मान तुझे,
घनघोर घटा बन जाऊँ तो
पल भर में छिप जाओगे ।

अन्तर मन के सागर में
कैसा इक तूफ़ान छिपा,
अधर सिले खुल जाएँ तो
निश्वासों में मिट जाओगे ।
***

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सुमन गौड़ कीक्षणिकाएँ- प्रेम!



प्रेम लौकिक है या अलौकिक या सिर्फ एक अहसास है अथवा मिलन है आत्मा से परमात्मा का या फिर दो संज्ञाओं का? प्रेम क्या है? न जाने कितनो ने पढ़ा और पढ़कर गुना और हो गए पंडित..वैसे तो ये ढाई आखर अपने में सम्पूर्ण सृष्टि समाये है पर आज प्रेम के इन ढाई आखरों को हम सुमन जी के नज़रिए से पढ़ने की कोशिश करते हैं..पेश है इन ढाई आखरों में समाई सुमन जी की सृष्टि और दृष्टि-


प्रेम क्या है
दो शब्दों का मिलन
दो आत्माओ का मिलन
दो देह का मिलन
या
लौकिकता से परे विश्वास का एक मूर्त रूप
***

प्रेम दो सरल शब्दों से बना
अलग अलग व्यक्तियों से जुड़ कर
अलग अलग रिश्तो को जन्म देते हुए
एक ही रूप में परिभाषित होता है
***

कहते है
प्रेम ईश्वर है
प्रेम साधना है
प्रेम भक्ति है
प्रेम इबादत है
प्रेम आस्था है
प्रेम में ये सब है
तो क्यू प्रेम
प्रेम से अलग हो जाता है?
***

तुम कहती हो
मुझसे प्रेम करती हो
मै कहता हूँ
तुमसे प्रेम करता हूँ
क्या कहने भर से प्रेम होता है
तो मै एक हज़ार बार तुम से प्रेम कर चुका हूँ
फिर तुम्हारा विश्वास डगमगाता क्यू है?
***

प्रेम, सिर्फ प्रेम है
निःस्वार्थ,नि:शब्द,निराकार
कुछ भी नष्ट नहीं होता प्रेम में
नष्ट होते है सिर्फ हम
अचेतन में दबी रहती है हमारी यादें, टूटे सपने
मासूम प्रसन्नताएँ,उजड़ी नींदे
उत्सवों मेलो पर
बाहर आती है कभी-कभी
प्रेम के जर्जर द्वार से
मौन उदासी के अहाते के आरपार
***

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एक मुक्तक, एक गीत- योगेन्द्र मौदगिल

योगेन्द्र मौदगिल- संक्षिप्त परिचय 
 
हास्य-व्यंग्य कवि एवं गज़लकार। कविता की ६ मौलिक एवं १० संपादित पुस्तकें प्रकाशित। भारत भर में मंचीय काव्य यात्राएं।
अनेक सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों व क्लबों से सम्मानित यथा २००१ में गढ़गंगा शिखर सम्मान २००२ में कलमवीर सम्मान २००४ में करील सम्मान २००६ में युगीन सम्मान २००७ में उदयभानु हंस कविता सम्मान व २००७ में ही पानीपत रत्न से सम्मानित. सब टीवी, जीटीवी, ईटीवी, एमएचवन, चैनलवन, इरा चैनल, इटीसी, जैनटीवी, साधना, नैशनल चैनल आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से नियमित कवितापाठ।

हरियाणा की एकमात्र काव्यपत्रिका कलमदंश का ६ वर्षों से निरन्तर प्रकाशान व संपादन। दैनिक भास्कर में २००० में हरियाणा संस्करण में दैनिक काव्य स्तम्भ तरकश का लेखन। दैनिक जागरण में २००७ में हरियाणा संस्करण में दैनिक काव्य स्तम्भ मजे मजे म्हं का लेखन। पानीपत व करनाल एवं आसपास पचासों अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के सफल संयोजन में सहभागिता।

हैं साधुऒं के भेष में शैतान आजकल.
गायब हुए जहान से इन्सान आजकल
हर चेहरे प नक़ाब के ऊपर नक़ाब है,
मुश्किल बहुत हर शख्स की पहचान आजकल.

जो भेद खुल गया तो शर्मसार हो गया.
हर आदमी धंदे का तलबग़ार हो गया.
कोई राम बेचता है, कोई नाम बेचता,
संतों के लिये धर्म कारोबार हो गया.

इस रंगबाज दुनिया में रंगों की मौज है.
सब जानते हैं, आजकल नंगों की मौज है.
जीते हैं शराफत से कहाते हैं बेवकूफ,
लुच्चों की खूब मौज, लफंगों की मौज है.

लो सभ्यता का दिनबदिन उत्कर्ष देख लो.
अरे, सास-बहू-टीवी में संघर्ष देख लो.
ना पद्मिनी, ना पन्ना और न लक्ष्मीबाई,
हैं मल्लिका व राखियां आदर्श देख लो.

जीने का सिर्फ नाम सा करता हूं आजकल.
सच कहूं तो किश्तों में मरता हूं आजकल.
बूढ़ों की हत्या, बच्चों से होता बलात्कार,
अखब़ार को पढ़ने से भी डरता हूं आजकल.

बेखुदी में कैसा दम भरने लगा है मन.
संदेह अपने आप पर करने लगा है मन.
लम्पट गुरूघंटाल, छोटी छोटी बच्चियां,
अब पाठशालाऒं से भी डरने लगा है मन.
***

जलते सूरज के पर, मन के भीतर खोजो.
क्यों भीग रहा अंबर, मन के भीतर खोजो.
क्यों बदल गये तेवर, मन के भीतर खोजो.
क्यों हो गये हम पत्थर, मन के भीतर खोजो..
अनसुलझे प्रश्न कितने मथते हैं जीवन को..
क्यों देह तरसती है जीवन भर यौवन को..
क्यों रिश्तों के ऊपर दीवारें भारी हैं..
बूआ से बहनों से क्यों बिटिया प्यारी है..
क्यों रिश्ते हैं नश्तर, मन के भीतर खोजो.
इन प्रश्नों के उत्तर, मन के भीतर खोजो..
चूल्हे दर चूल्हें हैं, हर चारदिवारी में..
कैक्टस ही कैक्टस हैं, सपनों की क्यारी में..
क्यों तोहमत के बादल घिर घिर कर आते हैं..
क्यों धब्बे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं..
कब होंगें हम बेहतर, मन के भीतर खोजो.
इन प्रश्नों के उत्तर, मन के भीतर खोजो..
ये नकली सा जीवन, हम कब तक जीयेंगें..
तुम कहो गरल के घूंट, हम कब तक पीयेंगें..
कंक्रीट के जंगल में घर का एहसास नहीं..
इक हाथ को दूजे पर भी तो विश्वास नहीं..
क्यों मन भारी अक्सर, मन के भीतर खोजो.
इन प्रश्नों के उत्तर मन के भीतर खोजो..
पेड़ों पर, भ्रूणों पर, भई विपदा भारी है..
इनके-उनके-सबके, हाथों में आरी है..
जो बेटियां कम होंगी और पेड़ भी कम होंगें..
नयी नस्लों के हिस्से में ग़म ही ग़म होंगें..
ये पाप क्यों धरती पर, मन के भीतर खोजो.
इन प्रश्नों के उत्तर मन के भीतर खोजो..
***
-योगेन्द्र मौदगिल

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डॉ. सुनील जोगी की कविता- माँ

संक्षिप्त परिचय
नाम : डॉ. सुनील जोगी
जन्म : १ जनवरी १९७१ को कानपुर में।
शिक्षा : एम. ए., पी-एच. डी. हिंदी में।
कार्यक्षेत्र : विभिन्न विधाओं में ४० पुस्तकें तथा गीत, ग़ज़ल व भजन के २५ कैसेट प्रकाशित। देश विदेश के अनेक मंचों व चैनलों से काव्य पाठ। फ़िल्मों के लिए गीत लेखन। पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। अनेक धारावाहिकों के शीर्षक गीत व स्क्रिप्ट लेखन। लोक सभा के अपर निजी सचिव के रूप में संसद भवन में कार्य। इंडिया मीडिया एंड इंटरटेनमेंट एकेडमी के निदेशक तथा अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति, भारत के राष्ट्रीय महासचिव।
मातृ दिवस के सुअवसर पर उनकी एक बेहद ही भावपूर्ण रचना आप सबके नज़र है. आशा है आपको पसंद आएगी...

माँ

किसी की ख़ातिर अल्‍ला होगा, किसी की ख़ातिर राम
लेकिन अपनी ख़ातिर तो है, माँ ही चारों धा
जब आँख खुली तो अम्‍मा की गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा-सा आँचल मुझको भूमण्‍डल से प्‍यारा था
उसके चेहरे की झलक देख चेहरा फूलों-सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से मुझको जीवन मिलता था
हाथों से बालों को नोचा, पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस माँ ने पुचकारा हमको जी भर के प्‍यार किया
मैं उसका राजा बेटा था वो आँख का तारा कहती थी
मैं बनूँ बुढ़ापे में उसका बस एक सहारा कहती थी
उंगली को पकड़ चलाया था पढ़ने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज अन्‍तर में सदा सहेजा था
मेरे सारे प्रश्‍नों का वो फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के काँटे चुन वो ख़ुद ग़ुलाब बन जाती थी
मैं बड़ा हुआ तो कॉलेज से इक रोग प्‍यार का ले आया
जिस दिल में माँ की मूरत थी वो रामकली को दे आया
शादी की, पति से बाप बना, अपने रिश्‍तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूँ माँ की ममता को भूल गया
हम भूल गए उसकी ममता, मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गए अपना जीवन, वो अमृत वाली छाती थी
हम भूल गए वो ख़ुद भूखी रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्‍तर देकर ख़ुद गीले में सो जाती थी
हम भूल गए उसने ही होठों को भाषा सिखलाई थी
मेरी नींदों के लिए रात भर उसने लोरी गाई थी
हम भूल गए हर ग़लती पर उसने डाँटा-समझाया था
बच जाऊँ बुरी नज़र से काला टीका सदा लगाया था
हम बड़े हुए तो ममता वाले सारे बन्‍धन तोड़ आए
बंगले में कुत्ते पाल लिए माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आए
उसके सपनों का महल गिरा कर कंकर-कंकर बीन लिए
ख़ुदग़र्ज़ी में उसके सुहाग के आभूषण तक छीन लिए
हम माँ को घर के बँटवारे की अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से गाली की भाषा तक ले आए
माँ की ममता को देख मौत भी आगे से हट जाती है
गर माँ अपमानित होती, धरती की छाती फट जाती है
घर को पूरा जीवन देकर बेचारी माँ क्‍या पाती है
रूखा-सूखा खा लेती है, पानी पीकर सो जाती है
जो माँ जैसी देवी घर के मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें इंसान नहीं बन सकते हैं
माँ जिसको भी जल दे दे वो पौधा संदल बन जाता है
माँ के चरणों को छूकर पानी गंगाजल बन जाता है
माँ के आँचल ने युगों-युगों से भगवानों को पाला है
माँ के चरणों में जन्नत है गिरिजाघर और शिवाला है
हिमगिरि जैसी ऊँचाई है, सागर जैसी गहराई है
दुनिया में जितनी ख़ुशबू है माँ के आँचल से आई है
माँ कबिरा की साखी जैसी, माँ तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली ख़ुसरो की अमर रुबाई है
माँ आंगन की तुलसी जैसी पावन बरगद की छाया है
माँ वेद ऋचाओं की गरिमा, माँ महाकाव्‍य की काया है
माँ मानसरोवर ममता का, माँ गोमुख की ऊँचाई है
माँ परिवारों का संगम है, माँ रिश्‍तों की गहराई है
माँ हरी दूब है धरती की, माँ केसर वाली क्‍यारी है
माँ की उपमा केवल माँ है, माँ हर घर की फुलवारी है
सातों सुर नर्तन करते जब कोई माँ लोरी गाती है
माँ जिस रोटी को छू लेती है वो प्रसाद बन जाती है
माँ हँसती है तो धरती का ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर धरती को शीश झुकाता है
माना मेरे घर की दीवारों में चन्‍दा-सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में बस केवल माँ की मूरत है
माँ सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, दुर्गा, अनुसूया, मरियम, सीता है
माँ पावनता में रामचरितमानस् है भगवद्गीता है
अम्‍मा तेरी हर बात मुझे वरदान से बढ़कर लगती है
हे माँ तेरी सूरत मुझको भगवान से बढ़कर लगती है
सारे तीरथ के पुण्‍य जहाँ, मैं उन चरणों में लेटा हूँ
जिनके कोई सन्‍तान नहीं, मैं उन माँओं का बेटा हूँ
हर घर में माँ की पूजा हो ऐसा संकल्‍प उठाता हूँ
मैं दुनिया की हर माँ के चरणों में ये शीश झुकाता हूँ
***
- डॉ. सुनील जोगी

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आगमन वसंत का- सुधीर सक्सेना 'सुधि'

परिचय
सुधीर सक्सेना 'सुधि' की साहित्य लेखन में रुचि बचपन से ही रही। बारह वर्ष की आयु से ही इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी प्रसारण। बाल साहित्य में भी खूब लिखा। पत्रकारिता व लेखन के क्षेत्र में राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान पाठक मंच, भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर, बाल गंगा (बाल साहित्यकारों की राष्ट्रीय संस्था, जयपुर) चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट के अलावा अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित 'सुधि' की अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अंतर्जाल की विभिन्न पत्रिकाओं में भी प्रकाशन। इसी क्रम में हिन्द-युग्म के माह अगस्त-2009 के यूनिकवि के लिए चयन। नुक्कड़ ब्लॉग पर नवम्बर-2009 में नुक्कड़ सर्वोत्तम बाल कविता सम्मान।

पिछले कुछ दिन से
मेरी धरती का रंग लाल है.
यह वसंत का नहीं
धरती के ही कुछ
बेटों का कमाल है.

वसंत तो आया था-
अपने तरीके, अपने हिसाब से
उसने बात भी की थी
सरसों, पलाश और गुलाब से
लेकिन बातचीत के बाद उतर गया
खुद वसंत का रंग!
और वसंत की राह देखने वालों के
आसपास कहीं नहीं था वासंती अहसास!

पीली चुनरिया, पीली चिट्ठियां और
पीलेपन के समूचे ख़याल
सब दूसरे ही रंग में रंगे हैं
जिन्हें रंगरेजों ने नहीं,
किन्ही औरों ने रंगा है
और यह साबित किया है कि-
इंसानियत का नहीं कोई सगा है!

अब तो लोग
हरसिंगार के फूलों से
वसंत का आगमन नहीं देखते
वे केवल देखने को बाध्य हैं
आग की लपटों का पीलापन
जिसमें जलते हैं
मानवीयता के रिश्ते
और क्षण भर पहले तक का अपनापन.

ऐसे में परिंदा तक शर्मिंदा है
कि वो किस वसंत के गीत सुनाए !!
क्योंकि हाल ही करोड़ों आँखों ने
एक के बाद एक उतरते रंग जो देखे हैं
जिनका हो गया है अंत.

फिर भी जो रंग बचा है,
यदि वासंती है वो
तो बुझे मन से कहता हूँ मैं
स्वागत है तुम्हारा वसंत!
***
-सुधीर सक्सेना 'सुधि'
75 / 44 , क्षिप्रा पथ, मानसरोवर,
जयपुर-302020

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