Archive for 2/1/11 - 3/1/11

डॉ. अंजना बख्शी की कविताएँ

डॉ. अंजना बख्शी: एक संक्षिप्त परिचय

समकालीन हिन्दी कविता में एक उभरता हुआ नाम।
जन्म : 5 जुलाई 1974 को दमोह, मध्य प्रदेश में।
शिक्षा : हिन्दी अनुवाद विषय मेम एम०फ़िल० तथा एम० सी०जे० यानी जनसंचार एवं पत्रकारिता में एम० ए०।
देश की छोटी-बड़ी अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
नेपाली, तेलेगू, उर्दू, उड़िया और पंजाबी में कविताओं के अनुवाद।
’गुलाबी रंगोंवाली वो देह’ पहला कविता-संग्रह वर्ष 2008 में प्रकाशित।
संपर्क : 207, साबरमती हॉस्टल, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली–110067

(१)

तस्लीमा के नाम एक कविता

टूटते हुए अक्सर तुम्हें पा लेने का एहसास
कभी कभी खुद से लड़ते हुए
अक्सर तुम्हें खो देंने का एहसास ,
या रिसते हुये ज़ख्मो में ,
अक्सर तुम्हे खोजने का एहसास
तुम मुझमे अक्सर जीवित हो जाती हो तस्लीमा
बचपन से तुम भी देखती रही मेरी तरह ,
अपनी ही कॉटेदार सलीबो पर चढ़ने का दुःख
बचपन से अपने ही बेहद क़रीबी लोगो के
बीच तुम गुजरती रही अनाम संघर्ष –यात्राओं से
बचपन से अब तक की उड्नो में ,
ज़ख्मो और अनगिनत काँटों से सना
खिचती रही तुम
अपना शरीर या अपनी आत्मा को
शरीर की गंद से लज्जा की सड़कों तक
कई बार मेरी तरह प्रताड़ित होती रही
तुम भी वक्त के हाथों ,लेकिन अपनी पीड़ा ,
अपनी इस यात्रा से हो बोर
नए रूप में जन्म लेती रही तुम
मेरे जख्म मेरी तरह एस्ट्रोंग नही
ना ही कद में छोटे हैं, अब सुंदर लगने लगे हैं
मुझे तुम्हारी तरह !
रिसते-रिसते इन ज़ख्मो से आकाश तक जाने
वाली एक सीढ़ी बुनी हैं मैने
तुम्हारे ही विचारों की उड़ान से
और यह देखो तस्लीमा
मैं यह उड़ी
दूर......... चली
अपने सुदर ज़ख्मो के साथ
कही दूर छितिज में
अपने होने की जिज्ञासाओं को नाम देने
या अपने सम्पूर्ण अस्तित्व की पहचान के लिए
तस्लीमा,
उड़ना नही भूली मैं .......
अभी उड़ रही हूँ मैं .....
अपने कटे पाओं और
रिसते ज़ख्मो के साथ
***
(२)

क्रॉस

ओह जीसस....
तुम्हारा मनन करते या चर्च की रौशन इमारत
के क़रीब से गुजरते ही
सबसे पहले रेटिना पर फ्रीज होता हैं
एक क्रॉस
तुम सलीबों पर चढ़ा दिए गए थे
या उठा लिए गए थे सत्य के नाम पर
कीलें ठोक दीं गयीं थीं
इन सलीबों में
लेकिन सारी कराहों और दर्द को पी गए थे तुम
मैं अक्सर गुजरती हूँ विचारों के इस क्रॉस से
तब भी जब-जब अम्मी की उगलियां
बुन रही होती हैं एक शाल ,
बिना झोल के ,लगातार सिलाई दर सिलाई
फंदे चढ़ते और उतरते जाते ,एक दूसरे को
क्रॉस करते हुए ..........
ओह जीसस .....
यहाँ भी क्रॉस ,
माँ के बुनते हाथों या शाल की सिलाईयों के
बीच और वह भी ,
जहाँ माँ की शून्यहीन गहरी आँखें
अतीत के मज़हबी दंगों में उलझ जाती हैं
वहाँ देखतीं हैं ८४ के दंगों का सन्नाटा और क्रॉस
ओह जीसस .......
कब तुम होंगे इस सलीब से मुक्त
या कब मुक्त होगी इस सलीब से में !!
***
(३)

माँ

माँ
भोर होते ही
उठ जाती
शाम ढलने तक
करती रहती अनवरत कार्य

माँ
जिसके माथे पर
पड़ती नहीं शिकन
करती है अपनी अंतर्वेदना की
पुकार छिपाने का प्रयास

माँ
जिसकी थकी आँखें
निहारती हैं / बेटी की विदाई
और बेटे के
परदेस से लौट आने की बाट
भीतर के कोलाहल से जूझती
बिखरती फिर
समेट लेती अपनी सारी ऊर्जा
अपने हृदय को देकर दिलासा

माँ
तुम बहुत याद आती हो
जब पीने को दिल करता
एक कप गर्म चाय
और तवे पर जल जाता है
जब हाथ रोटी बनाते
तुम बहुत याद आती हो

माँ
तुम तब भी
मेरे साथ थी
जब छोड़ा था मैंने तुम्हारा आँगन
करने संघर्ष बाहरी दुनिया से

माँ
तुम अब भी मेरे क़रीब हो
जब मैं तन्हाँ / और जाड़े की
सर्द धूप में बुनती हूं एक स्वैटर
तुम्हारे लिए
जिसकी हर सिलाई में
बुना है मैंने
तुम्हारे अनुभव का
एक-एक फंदा
इंतज़ार है मुझे हर फंदे से
तुम्हारे अनुभवों का डिजाईन बुनने का
और उसमें तुम्हारे स्नेह के
बटन टांकने का
***
(४)

क्रॉस

(1)
अम्मी की उंगलियां बुन रहीं हैं
एक शाल बिना झोल के
लगातार सिलाई-दर-सिलाई
फंदे चढ़ते और उतरते जाते
एक-दूसरे को क्रॉस करते
जैसे क्रॉस करती हैं दो कौमें
ओर मज़हबी फ़साद के व़क्त
लोगों के वजूद

(2)
गूंथकर आटा रस जाने को
रख देती है शबीना
जैसे रख देती थी मां
पांचवीं पढ़ते व़क्त
बालों को गूंथकर
लगा गिरि का तेल

वैसे ही गुंथ चला है
सारा संसार
धर्म, संप्रदाय
और आतंकवाद की सियासी ताक़तों की
रसदार चाशनी से
ताकि सेकते व़क्त रोटियां
गाढ़ा और कड़ा हो इसका फुलका
***
(५)

जिंदगी बेहद खूबसूरत हैं

जिंदगी बेहद ख़ूबसूरत है
कभी ये टमाटरो सी फक लाल होती है ,
कभी प्याज सा रुलाती है
तो कभी मिर्च सी तीखी और नीम्बू सी
चटपटी हो जाती है
जिंदगी बेहद ख़ूबसूरत है
कभी ये बच्चों की रंगबिरंगी फिरकी सी
चलती है गोल गोल
कभी ठहर जाती है, पल भर को जैसे
बचपन में माँ ठहर जाती थी
कहानी सुनाते वक्त,
और फिर उनका ओजमय
चेहरा बुनता था एक नई कहानी
उनके अपने संघर्षो की
ज़िंदगी बेहद ख़ूबसूरत है
ये बिखेरती हैं इन्द्रधनुषी छटा से सात रंग
और कभी–कभी तो हो जाती है बेरंग,
जैसे बिना देगी मिर्च के आलू–मटर
कभी ज़िंदगी गौतम बुद्ध सी शांत सौम्य
लगती है
तो कभी आत्मतायी सी दानवीर
कभी द्रोणाचार्य सी निष्ठुर ,जो मांग बैठता है
कर्ण से उसका अंगूठा , वैसे ही जिंदगी भी
मांगती हैं बहुत कुछ
सचमुच जिंदगी बेहद ख़ूबसूरत है
***
- डॉ. अंजना बख्शी

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रचना श्रीवास्तव की कविताएँ

रचना श्रीवास्तव: संक्षिप्त परिचय

भारत के लखनऊ शहर में जन्मी रचना श्रीवास्तव की लेखन, अभिनय, और संगीत में गहरी रूचि है। उन्होंने विज्ञान में स्नातक शिक्षा प्राप्त करने के बाद कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में परा स्नातक शिक्षा प्राप्त की है।

अमेरिका आने के बाद, कविता का पहला मंच बना डैलस का रेडियो हम तुम और श्रोता थे, समस्त डल्लास में बसने वाले भारतीय।इसके बाद वे रेडियो फन एशिया (डैलस), रेडियो सलाम नमस्ते (डैलस ), रेडियो मनोरंजन (फ्लोरिडा ) और रेडियो संगीत (हियूस्टन) में नियमित कविता पाठ कर चुकी हैं।

अनुभूति, साहित्य कुञ्ज, सृजन गाथा, लेखिनी, रचनाकर, हिंद-युग्म, हिन्दी नेस्ट, गवाक्ष, हिन्दी पुष्प, स्वर्ग विभा, हिन्दी मिडिया आदि कुछ प्रमुख पत्रिकाओं में उनके लेख, कहानियाँ और कविताएँ संस्मरण और साक्षात्कार प्रकाशित हुए हैं। वे डैलस में रेडियो संचालक भी रह चुकी हैं और अभिनव वाद-विवाद प्रतियोगिता, लोक संगीत और नृत्य में भी अनेक पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं।


(१)
झांकते हैं सपने

जिस्म की दरारों से
झांकते हैं सपने
जैसे फटे मोंजे से
झांकता है अंगूठा
ये सपने
जिसे सीलन भरे
अँधेरे कमरे में
चोरी-चोरी देख लेती हैं रूहें
तह करती हैं
और कपड़े से भर के बनी
तकिये के नीचे
सहेज के
रख देतीं है सपने
फिर भी
ग़रीब की जवान बेटी की तरह
महक जाते हैं ये
इस से विचलित होती हैं
परम्पराएँ
घायल हो जाती हैं मर्यादाएं
तब वो
इन नुचे सपनों को
कंडे सा सुखाती हैं दीवार पर
कभी चारा मशीन में
घास सा काट देती हैं
या मटके के पानी में डूबा के मार देती है
पर इन ज़हरीली
संगीनों के बीच भी
ये सपने पुनः उग जाते हैं
और झाँकने लगते हैं
जिस्म की दरारों से
***

(२)
तुम्हारे आने से

शब्द अलंकारों में सज
रस के परिधान धारण कर
स्वयं कविता में ढल जाते हैं
तुम्हारे आने से
तिनकों पर मुस्कुराती है ओस
ओस में दीखते हैं इन्द्रधनुषी रंग
और कर जाते हैं मेरा श्रृंगार
तुम्हारे आने से
महकने लगती है भावनाएं
इच्छा,चोंच में भर लेती हैं आकाश
प्रेम समृद्ध होने लगता है
तुम्हारे आने से
पकने लगता है कौमार्य
पलकों पर खिलते हैं कमल
अंजुरी भर जाती है पराग कणों से
तुम्हारे आने से
जी उठती हैं प्रार्थनाएँ
जल उठते हैं मंदिर के चिराग
मै पवित्र हो जाती हूँ
तुम्हारे आने से
***

(३)
ख़त्म होता महीना

ख़त्म होता महीना
कुछ आश्वासनों को जन्म देता है
घर का मालिक टांगता है
हर जरूरतों को
पहली तारीख की नोक पर
रख ले धैर्य
पहली तारीख पर ला दूंगा दवा
रात भर खांसती
माँ से बेटे ने कहा
बाबा पेट बहुत दुखता है
चूरन भी अब काम नहीं करता है
बिटिया मिलने वाली है तनख्वाह
बड़े डाक्टर को दिखा दूंगा
दर्द से तड़पती बेटी से पिता ने कहा
सुनो जी फट गई है मेरी धोती
पडोसी की नियत भी है खोटी
धन्नो लगा ले धोती में गांठ
जैसे तैसे बचा ले अपनी लाज
चिथड़े में लिपटी बीवी से पति ने कहा
पहली तारीख की पहली किरण
उम्मीद में जला चूल्हा,
उम्मीद की बनी चाय
उम्मीद का दामन पकडे हर शय मुस्काए
उम्मीद के कपड़े पहन ,सजा उम्मीद की चप्पल पैर में
उत्साह भरा निकला वो घर से
लौटा तो प्रश्न भरी आँखें
चिपक गईं उससे
देखत को भेली बाटत को चुरकुना
गरीब की तनखाह का यही हाल है होना
कुछ पैसे बनिए को दिए
कुछ मकान के किराये में गए
दोस्तों का उधार चुकाया
जो बचे वो ये रहे
बेबसी पिघल के गलों पर लुढ़क गई
माँ,धन्नो और बिटिया ने
अपनी जरूरतों की गठरी बांध
दुछत्ती पर डाल दी
वो जानती है की इन्हें करना होगा
पहली तारीख का इंतजार
***
-रचना श्रीवास्तव

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ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ

संक्षिप्त परिचय:
नामः ब्रज श्रीवास्तव
जन्मः ०५.०९.१९६६ (काँकर) जिला विदिशा
शिक्षाः एम.एस.सी. (गणित), एम.ए. (अंग्रेजी), बी.एड., एम.ए. (हिन्दी)
प्रकाशनः पहला कविता संग्रह ‘तमाम गुमी हुई चीज़ें’, हंस, पहल, सहारा समय, समकालीन भारतीय, वसुधा, कादंबिनी, आऊट लुक, दस बार साक्षात्कार, कला समय, जनसत्ता, रसरंग (दैनिक भास्कर), राष्ट्रीय सहारा, इंडिया टुडे, साहित्य, कथन, वागर्थ, संवेद वाराणसी, कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, अनुवाद आदि प्रकाशित।
प्रसारणः दूरदर्शन, आकाशवाणी में कविता पाठ
संप्रतिः सहायक परियोजना समन्वयक (सर्वशिक्षा अभियान, जिला शिक्षा केन्द्र, विदिशा (म.प्र.)
पताः २३३, हरिपुरा विदिशा, (म.प्र.) ४६४००१


१.
हम सराहें उन्हें भी

जो झूठ बालें अक्सर
और शरण दें मक्कारों को
जो बैठे रहें हरदम अना के घोड़े पर
तुम उन्हें सराहो

हम उनकी करेंगे तारीफ़
जो दुर्दिन में दिखाई दें थोडे से उदास
कभी तो हँसे ज़ोर से
ठंड के दिनों में पहने फुल आस्तीन की स्वेटर
निश्छल रहें बच्चों की तरह

तुम उन्हें सराहो तो सराहो
जो तुम्हें भी अवसर दें कामचोरी का
जो चापलूसी को ही समझें निष्ठा
जो ग़लत बात को पेश करें
सच बात के अंदाज़ में
तुम्हारा दाँत निपोरना जिन्हें प्रिय दृश्य

हम उनकी तरफ़दारी करेंगे
जो तुम जैसे लोगों के साथ रहकर भी
नहीं बदलते अपना स्वभाव
जो प्रेम में पड़कर दिखाई दें प्रेमी ही
बहुत हुआ तो हो जाए थोड़े से ग़ुस्सा
नफ़रत जिन्हें नापसन्द हो

तुम नहीं सराहो मुझे भी
फ़िलहाल मैं तुम्हे भी नहीं सराहूंगा

वह दिन तो आना ही है एक दिन
जब तुम मुझे सराहोगे मन ही मन
और मैं कहूंगा
हम सराहें उन्हें भी
जो अन्ततः
सच को सराहें
***

२.
हमारी क्या बिसात

छद्म चमक रहा है चँदा जैसा
बाज़ार सूरज बन जाना चाहता है

इस दौर में हमारा अस्तित्व क्या है ?

फ़रेब घुल रहा है वायु में
ले रहा है ऑक्सीजन का स्थान

संगीत की गद्दी पर बैठना चाहता है
धर्मों का शोर
महंगाई के ज़ुल्म पर सभी चकित हैं
मुक़र्रर तमगे चुराए जा रहे हैं

हमारी क्या बिसात ऐसे में
और कविता की तो और भी फ़ज़ीहत है
मालूम है
किसी भी दौर में नहीं फलीं अपेक्षाएँ

वैसे अभी ये दौर भी ख़त्म नहीं हुआ
अस्तित्व भी नेस्तनाबूत नहीं हुआ अभी।
***

३.
ख़राब व्यक्ति

सब कर रहे हैं उसका ज़िक्र
कह कर उसे ख़राब व्यक्ति

यह बहुत काम का समय है
जो जाया हो रहा
किसी के ज़िक्र में

उसकी उपस्थिति में
कहाँ रहा किसी के पास
इतना अवकाश कि
चर्चा हो किसी रुख़सत की

समय ख़राब करने के आदी लोगों को
उसने देना नहीं एक सीख

अब फिर उसके पास है वक्त
मुस्तला हैं सब
ख़राब व्यक्ति, ख़राब व्यक्ति कहने में ।
***

४.
ख़ास तौर से....

मैं क्यों यह कामना करता हूं
कि तुम मेरे नज़दीक आओ

मैं क्यों चाहता हूं
कि तुम मुझसे कभी
अंतिम रूप से नाराज़ न होना

मैं क्यों सोचता रहता हूं
कि तुम्हारे ख़िलाफ़ कभी कोई न हो
हवा भी दुःख न पहुंचाए तुम्हें।

मैं क्यों उम्मीद करता हूं
कि तुम मुझसे मीठा-मीठा बोलो
हाल-चाल पूछो

मैं इसलिए किए जा रहा हूं ये अनायास
कि तुम एक अच्छे शख्स हो
ख़ासतौर से मेरे लिए
तुम्हारे यहां होने के
बहुत ख़ास मायने हैं।
***
-ब्रज श्रीवास्तव

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श्रीमती सरस्वती प्रसाद की कविता- आईना

"दो निगाहों के लिए
दो नयन भटके हर कहीं
पर न पाया ठौर
अपना भी बना कोई नहीं
अब ये क्या अपनापनी
जब जा रही बरात है....क्या अनोखी बात है !"



ये पक्तियां हैं कविवर पन्त की मानस पुत्री और साहित्य के लिए समर्पित रश्मि प्रभा जी की माताजी श्रीमती सरस्वती प्रसाद जी की. आपका जन्म आरा (शाहाबाद) में हुआ . आपने १९६३ में हिंदी प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की शिक्षा ली . पुस्तकें पढ़ने से गहरा लगाव , कलम हमजोली बनी , अपनी भावनाओं को कविता , कहानी और संस्मरण का रूप देना . यह कार्य इनका स्वान्तः सुखाय है . कभी किसी पत्रिका में छप जाना ही इनका गंतव्य नहीं था , फिर भी कुछेक रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपीं.
   अपना परिचय आप स्वयं इस तरह देती हैं- "मैं वट-वृक्ष हूँ..तुम नव अंकुर..यही मान जीती हूँ..तेरे हित मैं स्वर्ण पात्र का हलाहल पीती हूँ... कुछ सपने बाकी हैं अपने..जिन्हें हैं पूरा होना..इसके बाद ही इस पंथी को गहरी नींद हैं सोना.. बचपन से मैं अपनी सोच को शब्दों का रूप देती आई..."
   आपका रचना संग्रह "नदी पुकारे सागर" हाल में प्रकाशित हुआ है. इस सन्दर्भ में आप कहती हैं कि "मेरे मान्य पिता श्री. पन्त इसकी भूमिका नहीं लिख सके पर उनकी अप्रकाशित कविता जो उन्होंने मेरे प्रयाग आगमन पर लिखी थी, इस संकलन में हैं जो भूमिका की भूमिका से बढ़कर हैं..."
ये आखर कलश के लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि आज अम्माजी की ये कविता प्रकाशित करने का गौरव प्राप्त हो रहा है.
आखर कलश अपनी समस्त टीम और सुधि पाठकों की तरफ से अम्माजी की दीर्घायु और सदा आरोग्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करता है.


आईना

तुमलोगों ने एक आईना बना रखा है
खुद को देखने का
मनचाही सूरत मनचाहे ख्याल
मनचाहा रंग-रूप....
कमाल का है वो आईना
जो चाहो वही बोलता है
आँखों की भाषा पढकर ही
प्रतिविम्ब प्रस्तुत करता है !
तुम कभी नहीं उस तिलस्मी आईने के पार जा सकोगे
नहीं जान पाओगे - दुनिया बहुत बड़ी है
कितने चेहरे मात्र बोलते ही नहीं
मनोभाव संजोकर रखते हैं !
खुद के आईने में देखते हुए-
एक एक दिन , महीने , साल बीत जायेंगे
मौसमी हवाएँ
दरवाज़े पर दस्तक देतीं गुजर जाएँगी
कितनी पारदर्शी सच्चाइयों से
तुम महरूम रह जाओगे
सोच भी नहीं पाओगे कभी
कि इस आईने के पार
कितना कुछ है जो सहज सरल विरल है !
इसका पछतावा
एक अकल्पनीय सी बात है - नहीं होगा
क्योंकि मनचाहे आईने में देखते हुए तुम
औरों की कौन कहे
अपनी आत्मा तक की पहचान भूल जाओगे !
***
सरस्वती प्रसाद

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राकेश श्रीमाल द्वारा लिखे जा रहे उपन्यास का अंश- तस्वीर


स्पेनिश लेखक "मारियो वर्गास ल्योसा" जैसे कद्दावर लेखक ने अपनी पुस्तक "लेटर्स टु ए यंग नॉवेलिस्ट" में लिखा है कि सभी भाषाओं में दो तरह के लेखक होते हैं- एक वे जो अपने समय में प्रचलित भाषा और शैली के मानकों के अनुसार लिखते हैं, दूसरी तरह के लेखक वे होते हैं जो भाषा और शैली के प्रचलित मानकों को तोड़कर कुछ एकदम नया रच देते हैं।

राकेश श्रीमाल इस परिभाषा में व्यक्त दूसरी कोटि के लिखकों में गिने जा सकते हैं. आप उपन्यास के प्रचलित मानको को चुनौती देते हुवे एक नए अंतरिक्ष में सितारों के बिस्तर पर लेटकर धरती पर किसी तस्वीर पर लिखे शब्दों को करीने से आकार देने का प्रयास कर रहे हैं.


तस्वीर

मैं आठ साल बाद बुआ के यहाँ पर हूँ। छत पर बने उनके एक अलग कमरे में। बुआ पलंग पर लेटी हुई है। उनकी तबियत इन दिनों ठीक नहीं रहती है। पूरे बाल सफेदी में चमक रहे हैं। कभी कभी सफेद बालों का होना भी चेहरे को कितनी खूबसूरती दे देता है। यह मैं बुआ के चेहरे पर देख रही हूँ। मैं नीचे शतरंजी पर बैठी हूँ। पलंग के नीचे लोहे के दो बडे सन्दूक रखे हुए हैं। मुझे जहाँ तक याद है, इनमें बुआ ने शादी के कपडे, कुछ धार्मिक पुस्तकें, बैंक की पास-बुक और हाथ से सिली थैली में खूब सारी रेजगारी रख रखी है। इसके अलावा इन सन्दूकों में सबसे ज्यादा ऊनी कपडे होंगे जो बुआ ने अपने जीवन के कई मौसमों में बुने होंगे।
आठ साल पहले बुआ ने ही तो मुझे सबसे पहले स्वेटर बुनना सिखाया था। दो घर आगे, दो घर पीछे, फिर एक घर छोडकर....... जैसे स्वेटर बुनना किसी का पता पाना हो।
बुआ की एकमात्र रुचि कई तरह के ऊनी वस्त्र बुनने की रही है। बुआ ने मम्मी को एक बार हल्के गुलाबी रंग की एक ऊनी शाल बनाकर दी थी। बुआ ने उस शाल के एक कोने में दीदी, मेरा और छोटी का नाम भी ऊन से काढ रखा है। बुआ छोटी को कभी असली नाम से नहीं जानती। बुआ समझती रही है कि छोटी का नाम छोटी ही है।
बुआ के पलंग के सिरहाने की तरफ बने एक आलिए में फूफाजी की तस्वीर लगी है। उस पर रंगीन रुई का हार पहनाया हुआ है। फूफाजी की इस तस्वीर को छोडकर मैंने उनकी अन्य कोई तस्वीर कभी नहीं देखी। फूफाजी कभी फोटो नहीं खिंचाते थे। वे इसे धार्मिक कार्य नहीं समझते थे। यह तस्वीर भी एक बार धोखे से अमर भाईसाहब ने निकाल ली थी। उस समय फूफाजी बुआ के कमरे की खिडकी पर खडे छत पर सूख रही मँगोडियों को देख रहे थे कि कहीं चिडयाँ आकर उन पर बीट नहीं कर दें। उसी समय अमर भाईसाहब शहर से नया नया कैमरा लेकर आये थे। उन्होंने फूफाजी का फोटो निकाल लिया और फुफाजी को चिलचिलाती धूप में कुछ पता ही नहीं चला।
किसी की मजाल नहीं थी कि फूफाजी को वह फोटो दिखा दें या उनसे कह भी दें कि आपकी तस्वीर निकाल ली गयी है। अमर भाईसाहब खुद फूफाजी से बहुत डरते थे। उन्होंने बडी मुश्किल से उसका एक प्रिण्ट बनवाया था और किसी को भी दिखाने के बाद हमेशा अपनी ताले वाली अलमारी में रखते थे। उन दिनों बुआ के यहाँ आने वाले हर रिश्तेदार के लिए अमर भाईसाहब से फूफाजी की तस्वीर देखना जैसे किसी मेले में जाने से कम नहीं होता था।
फूफाजी उस तस्वीर में खिडकी की चौखट पर दोनों हाथ टिकाये सीमेण्ट की गच्ची को देख रहे हैं। उनकी आँखें वैसी ही हैं जैसी कि अक्सर हुआ करती थीं। खिडकी पर लगा परदा उनके सिर के दायें तरफ झूल रहा है। उस परदे में भी बुआ ने ऊन के फूल काढ रखे हैं।
फूफाजी की उस तस्वीर को देखते हुए मैं सोच रही हूँ कि क्या मृत्यु के बाद उम्र सचमुच नहीं बढती। मृत्यु उम्र को बाँधने के लिए आती है। जैसे किसी तस्वीर की उम्र होती है। मेरे बचपन में खींची तस्वीर की उम्र में वही उम्र कैद है।
क्या तस्वीर भी एक तरह की मृत्यु है?
जिसे हम उसी क्षण में बाँधें जाने का एक भोला और सहर्श प्रयास करते हैं। तस्वीर के जरिए हम हमारी उम्र को हमेशा के लिए बाँधकर उसे जीवन भर देखते रहते हैं।
यह मृत्यु है या मृत्यु को जीतने का भ्रम?
तब क्या अमर भाई साहब ने धोखे से फूफाजी की जो तस्वीर निकाली थी, वह उनकी मृत्यु के पहले की मृत्यु है? और क्या फूफाजी तस्वीर में मृत्यु के डर से ही कभी तस्वीर नहीं निकलवाते थे?
हो सकता है कि बुआ अपनी नींद में रोज फूफाजी की तस्वीर से बात करती हो। वे अपने मन में शाम के गहराते अँधयारे में फूफाजी को तस्वीर से बाहर निकल सामने रखी कपडों की निवार वाली पुरानी आराम कुर्सी पर बैठते देखती होंगी। जैसे फूफाजी ने अभी-अभी खिडकी पर टिके अपने दोनों हाथ हटाये हों और आराम कुर्सी पर बैठते हुए उन हाथों की धूल झाडी हो।
बुआ फूफाजी से ऐसे समय क्या बात करती होगी? उनके साथ नहीं होने के दुख की या वैसी ही जैसी साथ में रहने पर किया करती थी? अगर फूफाजी मृत्यु के बाद भी बुआ के मन में सजीव हैं तब तो बुआ एक साथ दो जीवन जी रही हैं। एक अपना, एक फूफाजी का।
मैं कितने जीवन जी रही हूँ?
क्या मैं अपनी नींद में किसी के साथ बात करती हूँ? या यह सब कुछ मैं नहीं, केवल मेरी नींद ही जानती है?
शायद बुआ को भी रोज सुबह फूफाजी की तस्वीर के सामने अगरबत्ती लगाते हुए पता नहीं होता होगा कि शाम के अँधियारे में दवाई वाली नींद की गोली खाने के बाद वे रोज पलंग पर बैठकर सामने वाली आराम कुर्सी पर बैठे फूफाजी से बात करती हैं।
बहुत पहले बुआ ने बोला था कि उनकी शादी बारह साल की उम्र में हो गयी थी। उन्नीस साल की उम्र तक उन्होंने फूफाजी से दिन में कभी बात नहीं की थी। उसी दौरान तो अमर भाई साहब हुए थे। पापा ही उन दिनों बुआ को घर लिवाने के लिए आते थे। तब फूफाजी बैलगाडी में उन्हें छोडने रेल्वे स्टेशन तक आते थे, पर रास्ते में भी बुआ उनसे कोई बात नहीं करती थी।
फूफाजी के अन्तिम समय में बुआ और फूफाजी दोनों ही इस बदलते हुए समय को कोसा करते थे, जब शादी के पहले ही औरतें अपने खसम से न केवल बात करतीं बल्कि बाजार करने और खेल देखने भी जातीं। बुआ के बोलचाल के कोश में पति के लिए खसम और सिनेमा के लिए खेल शब्द ही रहे हैं। अमर भाईसाहब की षादी में भी भाभी ने तो कम घूँघट निकाल रखा था लेकिन बुआ ने एक हाथ का घूँघट निकाल रखा था।
बुआ नींद की गोली लेने के बाद सो गयी हैं। मैं शतरंजी पर बैठे बुआ के अतीत में जाग रही हूँ। पास ही आराम कुर्सी रखी है।
क्या फुफाजी अभी उस आराम कुर्सी पर बैठे हैं, जिन्हें केवल बुआ ही देख पा रही हैं? मृत्यु के बाद, जो मृत्यु में बस जाते है, उन्हें क्या केवल कुछ ही लोग देख पाते हैं? कुछ भी नहीं, केवल एक...... । वही व्यक्ति जिसने उसकी मृत्यु के पहले उसकी देह में वास किया है।
लेकिन यह सब मैं कैसे जानती हूँ?
क्या मेरे मन में भी ऐसी ही कुछ इच्छा दबी है?
नौकर कमरे के बाहर गच्ची पर हम सबके लिए बिस्तर बिछा रहा है। वह गद्दियों पर सफेद चादर डाल रहा है जिस पर सफेद लिहाफ वाले तकिये रखे जाएँगे। यह फूफाजी की पसन्द हुआ करती थी। वे कहा करते थे कि छत पर सोना हो तो चाँदनी की तरह सफेद बिस्तर पर सोना चाहिए।
माँ, अमर भाईसाहब और भाभी नीचे के कमरे में बातें कर रहे हैं। मैं सोयी हुई बुआ की शाल ठीक करके कमरे से बाहर निकल रही हूँ। मुझे लग रहा है कि आराम कुर्सी पर कोई बैठा हुआ मुझे देख रहा है। मैं दरवाजे तक पहुँचते हुए डर जाती हूँ।
अब मैं कमरे के बाहर हूँ। मैंने दरवाजा धीरे से अटका दिया है। नौकर बिस्तर बिछाने के बाद ऊपर आती सीढयों पर नीचे चौक से ठण्डे पानी की सुराही लेकर आ रहा है।
मैं रबर की चप्पलें पहलें छत पर टहल रही हूँ। घर के पिछवाडे मिट्टी की कच्ची सडक पर मटकी की कुल्फी का ठेले वाला घर जा रहा है।
मैं सफेद चादर ओढकर बिस्तर पर लेट गयी हूँ। मुझे दूर आसमान में टिमटिमाते सफेद तारे दिख रहे हैं। क्या इन सारे सफेद तारों ने भी सफेद बिस्तर की तरह अपनी-अपनी गोद में किसी को सुला रखा होगा?
पूरे आकाश में बिछे इन टिमटिमाते तारों के बिस्तर पर कौन सो रहे होंगे? क्या वे लोग जो इस पृथ्वी से चले गये हैं? क्या तारों के चमकीले बिस्तर पर नींद नहीं आने के पहले उन पर लेटे लोग पृथ्वी पर अपने प्रियजनों को खोज रहें होंगे? अगर ऐसे में, जब कोई किसी अपने व्यक्ति को देख लेता होगा, तब उसे कैसा लगता होगा?
अगर फूफाजी इस समय मुझे छत पर लेटे देख रहें होंगे, तब क्या सोच रहे होंगे? यही कि कितनी बडी हो गयी हूँ मैं...... लेकिन फूफाजी तो अभी बुआ के कमरे में आराम कुर्सी पर बैठे होंगे।
मैं लेटे हुए सो गई हूँ मेरे सफेद बिस्तर ने एक टिमटिमाते तारे का रूप धर लिया है। आसमान में दूर-दूर तक बिखरे तारों ने मुझसे दोस्ती कर ली है। मैं अपने तारे के लिए आकाश में कोई अच्छी जगह खोज रही हूँ।
नीचे पृथ्वी पर कोई मुझे पत्र लिख रहा है। उस पत्र के अक्षर उडते हुए मेरे पास आने का प्रयत्न कर रहे हैं। पर हवा में ही विलीन होते जा रहे हैं। मैं दूर से उन अक्षरों को पढने की कोशिश कर रही हूँ। मुझे मेरे नाम को छोड शेष कोई भी अक्षर पढने में नहीं आ रहे हैं।
मेरे तारे का बिस्तर आकाश में घूमते हुए उसका नाम रच रहा है।
क्या वह इसे पढ पा रहा है?
***
राकेश श्रीमाल: कवि,कथाकार,संपादक

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हरीश भादाणी- सादर श्रद्धांजलि- उन्ही की दो कविताएँ उन्ही स्वर में, उन्ही को समर्पित

राजस्थान के 'बच्चन' कहे जाने वाले प्रख्यात जनकवि हरीश भादाणी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है. फिर भी उनकी यादों को कुछ ताज़ा करना चाहूँगा. उनका हिंदी की लोकप्रि‍य प्रगति‍शील परंपरा में महत्‍वपूर्ण योगदान था। मंचीय कवि‍ताओं से लेकर साहि‍त्‍यि‍क कवि‍ताओं के श्रेष्‍ठतम प्रयोगों का बेजोड़ खजाना उनके यहां मि‍लता है। हिंदी और राजस्‍थानी कवि‍ता की पहचान नि‍र्मित करने में हरीशजी की केन्‍द्रीय भूमि‍का थी।‍ सड़क से जेल तक कि कई यात्राओं में आपको काफी उतार-चढ़ाव नजदीक से देखने को अवसर मिला । जनता के संघर्षों और जिंदगी के साथ एकमेक होकर जीने वाले वे बड़े कवि‍ थे। आम जनता में हरीश जी की कवि‍ताएं जि‍स तरह जनप्रि‍य थी वैसी मि‍साल नहीं मि‍लती। राजस्‍थान के वि‍गत चालीस सालों के प्रत्‍येक जन आंदोलन में उन्‍होंने सक्रि‍य रूप से हि‍स्‍सा लि‍या था। राजस्‍थानी और हिंदी में उनकी हजारों कवि‍ताएं हैं। ये कवि‍ताएं दो दर्जन से ज्‍यादा काव्‍य संकलनों में फैली हुई हैं। मजदूर और कि‍सानों के जीवन से लेकर प्रकृति‍ और वेदों की ऋचाओं पर आधारि‍त आधुनि‍क कवि‍ता की प्रगति‍शील धारा के नि‍र्माण में उनकी महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी। इसके अलावा हरीशजी ने राजस्‍थानी लोकगीतों की धुनों पर आधारि‍त उनके सैंकड़ों जनगीत लि‍खें हैं जो मजदूर आंदोलन का कंठहार बन चुके हैं।
आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे । कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी प्रोढ़शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें राजस्थानी में। राजस्थानी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता। ‘सयुजा सखाया’ प्रकाशित। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से ‘मीरा’ प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी(महाराष्ट्र), पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से ‘राहुल’, । ‘एक उजली नजर की सुई(उदयपुर), ‘एक अकेला सूरज खेले’(उदयपुर), ‘विशिष्ठ साहित्यकार’(उदयपुर), ‘पितृकल्प’ के.के.बिड़ला फाउंडेशन से ‘बिहारी’ सम्मान से आपको सम्मानीत किया जा चुका है । 1 जून 1933 को छोटी काशी कहे जाने वाले बीकानेर (राजस्‍थान)  में जन्मे हरीश भादाणी 2 अक्टूबर, 2009 में लम्बी बीमारी के बाद अनंत की यात्रा को प्रस्थान कर गए. आज उन्ही की कुछ कविताएँ उन्हीं की वाणी में उन्ही को श्रद्धांजलि स्वरुप समर्पित है.
उनकी प्रकाशि‍त रचनाऍं -
1. अधूरे गीत (हिन्दी-राजस्थानी) 1959 बीकानेर
2. सपन की गली (हिन्दी गीत कविताएँ) 1961 कलकत्ता
3. हँसिनी याद की (मुक्तक) सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर 1963
4. एक उजली नजर की सुई (गीत) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966 (दूसरा संस्करण-पंचशीलप्रकाशन, जयपुर)
5. सुलगते पिण्ड (कविताएं) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966
6. नश्टो मोह (लम्बी कविता) धरती प्रकाशन बीकानेर 1981
7. सन्नाटे के शिलाखंड पर (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर1982
8. एक अकेला सूरज खेले (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1983 (दूसरा संस्करण-कलासनप्रकाशन, बीकानेर 2005)
9. रोटी नाम सत है (जनगीत) कलम प्रकाशन, कलकत्ता, 1982
10. सड़कवासी राम (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर, 1985
11. आज की आंख का सिलसिला (कविताएं) कविता प्रकाशन, 1985
12. विस्मय के अंशी है (ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं का गीत रूपान्तर) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1988
13. साथ चलें हम (काव्यनाटक) गाड़ोदिया प्रकाशन, बीकानेर 1992
14. पितृकल्प (लम्बी कविता) वैभव प्रकाशन, दिल्ली 1991 (दूसरा संस्करण-कलासन प्रकाशन, बीकानेर 2005)
15. सयुजा सखाया (ईशोपनिषद, असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर मदनलाल साह एजूकेशन सोसायटी, कलकत्ता, 1998
16. मैं मेरा अष्टावक्र (लम्बी कविता) कलासान प्रकाशन बीकानेर, 1999
17. क्यों करें प्रार्थना (कविताएं) कवि प्रकाशन, बीकानेर, 2006
18. आड़ी तानें-सीधी तानें (चयनित गीत) कवि प्रकाशन बीकानेर, 2006
19. अखिर जिज्ञासा (गद्य) भारत ग्रन्थ निकेतन, बीकानेर, 2007
राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें:
1. बाथां में भूगोळ (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर, 1984
2. खण-खण उकळलया हूणिया (होरठा) जोधपुर ज.ले.स
3. खोल किवाड़ा हूणिया, सिरजण हारा हूणिया (होरठा) राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति जयपुर
4. तीड़ोराव (नाटक) राजस्थानी भाषा-साहित्य संस्कृति अकादमी, बीकानेर पहला संस्करण 1990 दूसरा 1998
5. जिण हाथां आ रेत रचीजै (कविताएं) अंशु प्रकाशन, बीकानेर

फेरों बाँधी हुई सुधियों को

फेरों बँधी हुई सुधियों को
          कैसे कितना
           और बिसारें
आती ही जाती
लहरों-सी
दूरी से सलवटें संजोती
तट की फटी दरारों में ये
फेनाया-सा
तन-मन खोती
अनचाहा यह मौन निमन्त्रण
कौन बहानों से इन्कारें

फेरों बँधी हुई सुधियों को
          कैसे-कितना
           और बिसारें

रतनारे नयनों को मूँदे
पसर-पसर
जाती रातों में
सिहर-सिहर
टेरें भरती हैं
खोजी सपनों की बातों में
साँसों पर कामरिया का रंग
किन हाथों से पोंछ उतारें

फेरों बँधी हुई सुधियों को
         कैसे, कितना
           और बिसारें

परदेशी जैसी
अधसोई
अलसा-अलसा कर अकुलाती
सूरज देख
लाजवंती-सी
उठ जाती
परभाती गाती
धूप चदरिया मिली ओढ़ने
फिर क्यों तन से इसे उतारें

फेरों बंधी हुई सुधियों को
          कैसे-कितना
           और बिसारें
***
यह कविता स्वयं हरीश भादाणी के स्वर में यहाँ सुने :-


चाहे जिसे पुकार ले तू ...अगर अकेली है!


चाहे जिसे पुकार ले तू
       अगर अकेली है!

संध्या खड़ी मुंडेर पर
पछुवाए स्वर टेर कर
अँधियारे को घेर कर
ये सब लगे अगर परदेशी
आंगन दीप उतार ले तू
        अगर अकेली है!
चाहे जिसे पुकार ले तू.....

देख सितारे और गगन,
दुखती-दुखती बहे पवन
घड़ियाँ सरके बँधे चरण
ये भी लगे अगर परदेशी
कल का सपन संवार ले तू
अगर अकेली है!
चाहे जिसे पुकार ले तू
       अगर अकेली है!

टहनी-टहनी बांसुरी
आई ऊषा नागरी,
खिली कमल की पांखुरी
गीत सभी पूरब परिवेशी
अपने समझ पुकार ले तू
अगर अकेली है!
चाहे जिसे पुकार ले तू
       अगर अकेली है!
***
यह कविता स्वयं हरीश भादाणी के स्वर में यहाँ सुने :-



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हरीश बी शर्मा की कविताएँ

हरीश बी शर्मा पत्रकारिता के क्षेत्र के एक सजग प्रहरी होने के साथ-साथ एक संवेदनशील चिन्तक, कवि, कथाकार और नाटककार भी हैं. आपकी लेखनी मानव समाज में इर्द-गिर्द मौजूद व्यावहारिक धरातल पर यथार्थ का अवलम्ब लेकर मुखरित होती है तथा तटों से टकरा कर लौटती लहरों की तरह पलायनवादी न होकर पर्वतों को चीर कर यथार्थ का झरना बहाने की क्षमता भी रखती है. आपके लेखन में कोरी कल्पना के स्थान पर सत्यान्वेषण, संवेदनशीलता और बोद्धिकता की त्रिवेणी मुखरित होती है.
लिखना इनका शौक है और पेशा भी। शायद यही वजह है कि खुश रहते हैं। हालांकि, वे इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उन्हें अपने शौकिया और पेशवर लेखन में एका स्थापित करने की कोई जल्दबाजी भी नहीं दिखती। उनसे पूछने पर वे एक ही बात कहते हैं कि ‘उडती रेत, बहता पानी तपता सूरज साथी है, इनसे है मेरा सांसों-दम, इतनी मेरी थाती है।’ नाटक, कहानी और कविता की चार कृतियों के इस रचनाकार का मुखर पक्ष है पत्रकारिता। एक पत्रकार के रूप में बीकानेर संवाद से शुरू हुए सफर में निर्भय कलम, दैनिक लोकमत और दैनिक भास्कर शामिल है।
बीकानेर मूल के हरीश बी. शर्मा का जन्म 9 अगस्त 1972 को कोलकाता में हुआ। पत्रकारिता में स्नातक और हिंदी में स्नातकोत्तर हरीश इन दिनों राजस्थानी भाषा में एमए करने के प्रयास में है। अपने पहले राजस्थानी कविता संग्रह ‘थम पंछीडा’ के शीर्षक से ही चर्चा में आए हरीश का दूसरा कविता संग्रह भी ‘फिर मैं फिर से फिरकर आता’ भी खासा चर्चित रहा। इसके अलावा किशोर वय के पाठकों के लिए लिखा उनका कहानी संग्रह ‘सतोळियो’ है। हिंदी और राजस्थानी में लगभग 2॰ नाटक लिख चुके शर्मा के अधिकांश नाटक मंचित हैं। इन नाटकों में ‘हरारत’,भोज बावळो मीरां बोलै’, ‘ऐसो चतुर सुजान’, ‘सलीबों पर लटके सुख’, ‘सराब’, ‘एक्सचेंज’, ‘जगलरी’, ‘कठफोडा’, ‘अथवा-कथा’, ‘देवता’, ‘गोपीचंद की नाव’, ‘प्रारंभक’ ‘पनडुब्बी’ प्रमुख हैं।
शिमला, जयपुर, अजमेर और बीकानेर में मंचित इन नाटकों को समान रूप से दर्शकों की सराहना मिलती रही है। क्रियेटिव राइटर के रूप में पहचान बनाने वाले हरीश बी. शर्मा दैनिक भास्कर से जुडे पत्रकार हैं। इस लिहाज से वर्तमान में दैनिक भास्कर, हनुमानगढ क्लस्टर एडीशन के प्रभारी हैं। विभिन्न सरकारी, गैरसरकारी संस्थानों से समय-समय पर सम्मानित हरीश बी. शर्मा संतोषानंद और निदा फाजली के साथ हुई मुलाकात को बडा सम्मान मानते हैं। हालांकि उनकी मुलाकात के अफसानों में अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, राज बब्बर, सन्नी देओल, बॉबी देओल, अक्षय कुमार, प्रीति जिंटा, करीना कपूर, गोविंद नामदेव, गुलशन ग्रोवर, मिलिंद सोमन, असरानी, राजू श्रीवास्तव जैसी सेलीब्रिटी शामिल है तो टॉम ऑल्टर, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, गोविंदाचार्य जैसी शख्सियतों से जुडे कई प्रसंग हैं।
ब्लॉग लेखन में सक्रिय हरीश बी. शर्मा की अपनी साइट हरीशबीशर्मा डॉट कॉम है तो मरुगंधा पर भी हरीश की रचनाएं उपलब्ध हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के बीकानेर जिला अध्यक्ष रहे हरीश बी. शर्मा ने विजेता स्टार ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना की है। ‘हमारे फन के बदौलत हमें तलाश करे, मजा तो तब है के शोहरत हमें तलाश करे’ मुन्नवर राणा के इस शेर से खासे प्रभावित हरीश बी. शर्मा मानना है कि सृजन के क्षण खास नहीं होते हैं, खास अनुभूतियां होती हैं जो सृजन की प्रेरणा बनती है।

क्योंकि आदमी हैं हम

(एक)

मैं सरयू तट पर नाव लेकर
आरण्यक में एक से दूसरी शाख पर झूलते
लंका में अस्तित्त्वबोध के शब्द को संजोए
अपनी कुटिया में रामनाम मांडे
अलख जगाए-धूनी रमाए
प्रतीक्षा करता हूं-प्रभु की
और निष्ठुर प्रभु आते ही नहीं।

(दो)

चाहता हूं प्रभु
फिर तुम्हें एक लंबा वनवास मिले
अपने परिवार से होकर अलग
तुम वन-वन भटको
रात-रात भर सीते-सीते करते जागो
फिर जब सीता मिले
उसको भी त्यागो

(तीन)

हे राम!
पुरुषोत्तम की यह उपाधि
तुम्हे यूं ही नहीं दी गई है
मर्यादा के, साक्षात सत्य के अवतार थे तुम तो
तभी तो तुम पुरुषोत्तम कहलाए।
विश्वसुंदरी की तरह चलवैजयंती भी नहीं है यह उपाधि
जो हर साल किसी और को मिल जाए
क्या तुम्हें इतना भी पता नहीं है!

(चार)

प्रभु!
इतने स्वार्थी मत बनो
मानवता के नाते आओ
हे अवतार! हे तारणहार!
हमें इन अमानुषों
समाजकंटकों से बचाओ
कब तक हम
इन दानवों से लड़ सकते हैं
आखिर तो बाल-बच्चेदार हैं
परिवार-घरबार, भरापूरा संसार है
कैसे बिखरती देख सकती हैं
मेरी इंसानी आंखें यह सब

(पांच)

वादा रहा
आपका संघर्ष व्यर्थ नहीं जाने दूंगा
मंदिर बनवाऊंगा, मूर्तियां लगवाऊंगा
मानवता के प्रति आपकी भूमिका के पेटे
एक वाल्मीकी, हाथों-हाथ अपॉइंट करवा दूंगा
वक्त-जरूरत
तुलसीदास जैसों की सेवाएं भी ली जाएंगी
आप आइये जरूर खूब महिमा गाई जाएंगी।
***

जिंदगी

जीवन को
धूप-छांव का सहकार कहो
या दाना चुगती चिड़ियों के साथ
नादां का व्यवहार
पागल के हाथ पड़ी माचिस-सी होती है जिंदगी
दीवाली की लापसी, ईद की सिवइयां
क्रिसमस ट्री पर सजे चॉकलेट्स से
बहुत मीठी होती है जिंदगी
जिसे जीना पड़ता है

लेकिन सुधी पाठक ज्यादा माथा नहीं दुखाते
किताब बंद करते होते हैं
जब समाप्त लिखा आता है।
***

पेपरवेट

फड़फड़ाते कागजों के हाथों
'आखा' देकर, पवित्रता की पैरवी करती
दंतकथाएं सुनाती बुढ़ियाएं
कितनी ही तीज-चौथ करवा चुकी है
लेकिन अब ये पेपरवेट कम होने लगे हैं
उड़ने लगे हैं कथा के कागज
चौड़े आने लगा है चंदामामा से धर्मेला
तीज-चौथ आज भी आती है
भूखे पेट रहकर, आखा हाथ मे रखकर
बची-खुची बुढ़ियाएं तलाश, कथाएं फिर सुनी जाती है
फिर होती है ऐसे पतियों पर बहस
घंटों चलती है - उस जमाने पर टीका-टिप्पणी
सीता और द्रोपदी के दुख-सुख पर चटखारे
चलनी की आड़ से देखे चांद की
खूबसूरती भी शेयर की जाती है
'हम ही क्यों रखें व्रत'
ऐसी सुगबुगाहट भी होती है
कुछ ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देते
कहते हैं-बाकी है अभी बहुत कुछ
कुछ कहते हैं-खेल ही अब शुरू होगा बराबरी का
जब कुछ भी नहीं रहेगा चोरी-छाने
***
-हरीश बी शर्मा

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आलोक श्रीवास्तव की दो ग़ज़लें

जीवन परिचय:
30 दिसंबर 1971 शाजापुर (म.प्र) में जन्मे आलोक सुपरिचित ग़ज़लकार, कथा-लेखक, समीक्षक और टीवी पत्रकार हैं. आलोक के जीवन का बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक नगर विदिशा में गुज़रा है और वहीं से उन्होंने हिंदी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण की है. 'रिश्तों का कवि' कहे जाने वाले आलोक की रचनाएं लगभग दो दशक से देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं. वर्ष 2007 में 'राजकमल प्रकाशन दिल्ली' से प्रकाशित आलोक का पहला ग़ज़ल-संग्रह आमीन सर्वाधिक चर्चित पुस्तकों में रहा और कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया और अब उनकी ग़ज़लों का रूसी के अलावा पंजाबी, गुजराती व अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो रहा है. आलोक ने उर्दू के प्रतिष्ठित शायरों की काव्य-पुस्तकों का हिंदी में महत्वपूर्ण संपादन-कार्य किया है साथ ही वे अक्षर पर्व मासिक की साहित्य वार्षिकी (2000 और 2002) का अतिथि संपादक भी रहे हैं.
कार्यक्षेत्र:
* संपादक व प्रबंधक : रामकृष्ण प्रकाशन (1999-2004)
* वरिष्ठ उप संपादक : दैनिक भास्कर (2004-2005)
* प्रोड्यूसर : इंडिया टीवी (2005-2007)
* प्रोड्यूसर : न्यूज़ चैनल 'आजतक'(2007-अबतक)
रचना क्षेत्र:
लगभग दो दशक से ग़ज़लें, नज़्में, गीत, कहानियां और समीक्षाएं लिख रहे हैं जो समय-समय पर हंस, कथादेश, कथन, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, अक्षर पर्व, साक्षात्कार, गगनांचल, नवनीत, समरलोक, पर्वत राग, आउटलुक, इंडिया टुडे, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, आज, अमर उजाला, नई दुनिया, नव भारत और स्वतंत्र वार्ता जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समवेत संग्रहों में प्रकाशित हुई हैं.
पुरस्कार:
समग्र लेखन के लिए 'अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान (भोपाल) - 2002'
'आमीन' के लिए 'मप्र साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार पुरस्कार - 2007'
'आमीन' के लिए रूस का 'अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान (मॉस्को) - 2008'
'आमीन' के लिए 'भगवशरण चतुर्वेदी सम्मान (जयपुर) - 2008'
'आमीन' के लिए 'हेमंत स्मृति कविता सम्मान (मुंबई) - 2009'
'आमीन' के लिए 'परंपरा ऋतुराज सम्मान (दिल्ली) - 2009'
साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 'विनोबा भावे पत्रकारिता सम्मान (राजस्थान) - 2009'
समग्र लेखन के लिए 'वेद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार (मेरठ) - 2010'
समग्र लेखन के लिए माइनॉरिटी फ़ॉरम, विदिशा द्वारा 'फ़क्र-ए-विदिशा अवॉर्ड - 2010'
समग्र लेखन के लिए 'लाला जगत ज्योति प्रसाद साहित्य सम्मान (बिहार) - 2010'
कृतियाँ:
'आमीन : ग़ज़ल संग्रह (2007) राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-2
सलाखें : कथा संग्रह (शीघ्र प्रकाश्य)
नई दुनिया को सलाम : अली सरदार जाफ़री (संपादन)
अफ़ेक्शन : डॉ. बशीर बद्र (संपादन)
हमक़दम : निदा फ़ाज़ली (संपादन)
लॉस्ट लगेज : डॉ. बशीर बद्र (संपादन)
आलोक श्रीवास्तव को हाल ही में रूस के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय 'पुश्किन सम्मान' से पुरस्कृत किए जाने की घोषणा हुई है.


ग़ज़ल (१) सखी पिया

सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां
कि जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अंखियां

दिलों की बातें दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं
वो सुनना चाहें ज़ुबां से सब कुछ, मैं करना चाहूं नज़र से बतियां

ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है
सुलगती सांसे, तरसती आंखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां

उन्हीं की आंखें , उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू
किसी भी धुन में रमाऊं जियरा, किसी दरस में पिरोलूं अंखियां

मैं कैसे मानूं बरसते नैनो कि तुमने देखा है पी को आते
न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियां
***

(अमीर ख़ुसरो को ख़िराजे-अक़ीदत जिनके मिसरे पर ये ग़ज़ल हुई)


ग़ज़ल (२) हमन है इश्क़ मस्ताना

हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या,
गुज़ारी होशियारी से, जवानी फिर गुज़ारी क्या.

धुएं की उम्र कितनी है, घुमड़ना और खो जाना,
यही सच्चाई है प्यारे, हमारी क्या, तुम्हारी क्या.

उतर जाए है छाती में जिगरवा काट डाले है,
मुई महंगाई ऐसी है, छुरी, बरछी कटारी क्या.

तुम्हारे अज़्म की ख़ुशबू लहू के साथ बहती है,
अना ये ख़ानदानी है, उतर जाए ख़ुमारी क्या.

हमन कबिरा की जूती हैं, उन्हीं का क़र्ज़ भारी है,
चुकाए से जो चुक जाए, वो क़र्ज़ा क्या उधारी क्या.
***

(कबीर को ख़िराजे-अक़ीदत जिनके मिसरे पर ये ग़ज़ल हुई)

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