Thursday, August 18, 2011

डॉ. मालिनी गौतम की कविताएँ






खंजर

बरसों पहले
जो खंजर
तुमने उतारा था
सीने के आर-पार
वहाँ से रिसता है
लहू आज भी..
स्याह अंधेरी रातों में
चीख मारकर
बैठ जाती हूँ मैं
जब सनी होती है
मेरी सफेद चादर
खून से....
मेरी हथेली पर
उगा चाँद
नीचे गिरकर
हो जाता है चकनाचूर
और बिलखने लगते हैं
टुकड़े फर्श पर..
नीली रौशनी पर
पुत जाती है
दर्द की कालिख
 अब तो चाँद भी डरता है
मेरे नज़दीक आने से...
सुई-धागा लिये मैं
रात-रात भर
सीती रहती हूँ
फटे हुए जख्मों को,
या खुदा....रहम कर
कब तक धोती रहूँगीं मैं
लहू के दाग
इन सफेद चादरों से।
***
एक सोता मीठे पानी का

  तुम छल किसे रहे हो.?
मुझे या अपने आप को...?
दूर किससे भाग रहे हो...?
मुझसे या अपने आप से...?
क्या साबित करना चाहते हो
कि तुम्हें मेरी परवाह नहीं...?
मेरे होने न होने से
तुम्हे कोई सरोकार नहीं...?
तो क्यों मेरी पायल की
खनक सुनकर
तुम सतर्क हो जाते हो..
क्यों मौका मिलते ही
कनखियों से मुझे
देखना नहीं चूकते..
जब चोट मुझे लगती है
तो रंगत तुम्हारी फीकी पड़ जाती है..
जब मेरा ध्यान
तुम्हारी ओर नहीं होता
तुम गौर से पढ़ते रहते हो
मेरे जर्द हो चुके पीले चेहरे को..

इस तरह दूर रह-रहकर
क्या भुला पाओगे मुझे..
कहाँ-कहाँ से मिटा सकोगे
मेरे होने के निशानों को..
मैं तो नज्म बनकर
उतर चुकी हूँ
तुम्हारे जिस्म में
दर्द बनकर बहती हूँ
तुम्हारी नसों में
कतरा-कतरा काटकर क्या
मुझे अलग कर पाओगे...
मेरे साथ-साथ तुम भी तो
कटते चले जाओगे...
तो नज्म को
गुनगुना क्यों नहीं लेते..
इस बूँद-बूँद अहसास को
निचोड़कर अपने सीने में
जज्ब कर लो
शायद बरसों से जमें
खारे पानी के दाग
धुल जाएँ
और मीठे पानी का एक सोता
फूट निकले
तुम्हारे भीतर भी कहीं.....
***

6 comments:

कौशलेन्द्र said...

दर्द और द्वन्द से पीछा कब छूट पाता है ....पर खुशियों का दिया भी इन्हीं के बीच जलता है

Dr (Miss) Sharad Singh said...

डॉ. मालिनी गौतम जी,
बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई....

ashok andrey said...

bahut hee achchhi rachna se rubroo hua hoon, itni sundar bhavbhivayki ke liye malini jee ko badhai.

डॉ. हरदीप कौर सन्धु said...

सुन्दर ....
भावपूर्ण कविता

हार्दिक बधाई....

Rachana said...

gahre bhav liye mohak kavitayen
rachana

Sawai Singh Rajpurohit said...

बहुत ही अच्छा लिखा है!

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