राह कठिन कोई नहीं, मन में लो यदि ठान।
परबत भी करते नमन, थम जाते तूफ़ान॥
(2)
जब तक सागर ना मिले, नदी नदी कहलाय।
जिस दिन सागर से मिले, नदी कहाँ रह जाय॥
(3)
हमने तो बस प्रेम से, दी उसको आवाज़।
जग ने देखा चौंक कर, लोग हुए नाराज॥
(4)
प्रेम नहीं सौदा यहां, ना कोई अनुबंध।
प्रेम एक अनुभूति है, जैसे फूल सुगंध॥
(5)
छल, कपट और झूठ से, जो शिखरों पर जाय
जब गिरे वो धरती पे, उठ कभी नहीं पाय॥
(6)
आया कैसा ये समय, जग में देखो यार।
सच्चे को लाहनत मिले, झूठे को जयकार॥
(7)
जिनकी खातिर हम लड़े, जग से सौ-सौ बार।
वो ही करते पीठ पर, छिप कर गहरे वार॥
***
नाम : सुभाष नीरवजन्म : 27-12-1953, मुरादनगर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा : स्नातक।
प्रकाशित कृतियाँ : तीन कहानी संग्रह, दो कविता संग्रह, एक बाल कहानी संग्रह। पंजाबी से लगभग डेढ़ दर्जन से भी अधिक पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद।
ब्लॉग्स : साहित्य और अनुवाद से संबंधित अंतर्जाल पर ब्लॉग्स- सेतु साहित्य, कथा पंजाब, साहित्य सृजन, सृजन यात्रा, गवाक्ष और वाटिका।
सम्प्रति : भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में अनुभाग अधिकारी।
सम्पर्क : 372, टाइप-4, लक्ष्मीबाई नगर, नई दिल्ली-110023
ई मेल : subhashneerav@gmail.com


10 comments:
जिनकी खातिर हम लड़े, जग से सौ-सौ बार।
वो ही करते पीठ पर, छिप कर गहरे वार॥
Sabhi dohe bahut ache hain bahut-bahut badhai...
राह कठिन कोई नहीं, मन में लो यदि ठान।
परबत भी करते नमन, थम जाते तूफ़ान॥
ye bahut pasnd aayaa
भाई इरशाद जी ने मेल द्वारा अपनी प्रतिक्रिया प्रेषित की-
इन बह्तरीन दोहो के लिये सुभाष निरव जी को बधाई !
जिनकी खातिर हम लड़े, जग से सौ-सौ बार।
वो ही करते पीठ पर, छिप कर गहरे वार॥
sabhi dohe behtareen, saamyik aur saargarbhit. shubhkaamnaayen.
सम्मानिया देवी नागरानी जी ने अपनी टिपण्णी मेल द्वारा प्रेषित की, शायद किसी तकनीकी खामी के चलते टिपण्णी प्रेषित नहीं हो पाई थी-
Narendra ji
AAkhar kalsh par is vidha ko dekhkar bahut hi annad mila
har doha arthpoorn, sandesh poorn, utsaahvardak
Subash Neerav ji ke sabhi dohe atyant sunder manobhavon ko liye hue hai.
Tippni site par do baar post ki par lagta hai sweekari nahin gayi
sadar
Devi nangrani
dohe likhna asan nahi .aap kaese likh lete hain fir itne achchhe jo ki barson yad rahen
bahut bahut sunder
राह कठिन कोई नहीं, मन में लो यदि ठान।
परबत भी करते नमन, थम जाते तूफ़ान॥
kamal
जिनकी खातिर हम लड़े, जग से सौ-सौ बार।
वो ही करते पीठ पर, छिप कर गहरे वार॥
sach ek dam sach kaha hai aapne
saader
rachana
सभी दोहे अच्छे लगे।
नीरव जी को बधाई !
मुझे लगता है इस दोहे पर ध्यान देने की आवश्यकता है, संभवतः टायपिंग में शब्द आगे पीछे या कुछ छूट/ जुड़ गया है, छंद भंग हो रहा लगता है।
छल, कपट और झूठ से, जो शिखरों पर जाय
जब गिरे वो धरती पे, उठ कभी नहीं पाय॥
जी कविता जी, आपने सही कहा है। भाई लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी ने भी इस ओर संकेत किया है- दोहा शायद सही रूप में इस प्रकार होना चाहिए -
झूठ और छल-कपट से, जो शिखरों पर जाय
जब वो धरती पे गिरे, कभी नहीं उठ पाय॥
भरत जी, भावना जी, इरशाद जी, जेन्नी जी, देवी नांगरानी जी, रचना जी का भी आभारी हूँ जिन्होंने अपनी राय से अवगत कराया।
सुभाष नीरव
नीरव जी,
आपने टिप्पणी को अन्यथा नहीं लिया और सही संदर्भ में ही लिया, तदर्थ आभारी हूँ। आपका बड़प्पन है। इत्मीनान हुआ। सधन्यवाद।
नमस्कार ,
राह कठिन कोई नहीं, मन में लो यदि ठान।
परबत भी करते नमन, थम जाते तूफ़ान॥ वाह ---------सभी दोहे एक से बढाकर एक . बधाई,
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