नरेश मेहन की कविताएँ

1.  पत्ता
दूर से उडता हुआ
एक पत्ता
आ कर
मेरे कन्धे पर
बैठ गया

मैंने पूछा
कहाँ से आए हो
इस कदर
अनायास गुमसुम से।

वह सकपकाया
मायूस हुआ
फिर बोला
शहर से आया हूँ
जबरी डाल से छिटक कर
न चाहते हुए भी
उसी नन्हीं डाल से
बिछुड कर।

शहर मे
अब मेरा
दिल नहीं लगता
दम घुटता है मेरा
धुएँ में उदास
पेड कीशाख पर।

मुझे दो कंधा
मेरे भाई
मुझे अपने
साथ ले चलो
शहर से दूर
किसी नदी किनारे
किसी खेत पर
छोटे से गाँव में।

2. मेरी छत
मेरी छत
मुझ पर
गिरने को
तैयार है

मैं फिर भी
उसी छत के नीचे
सोता हूँ।

मुझे मालूम है,
मेरा देश
पडौसी देश
रखता है
परमाणु बम।

चाहता है
दफनाना मुझे
उसी छत के नीचे
खत्म करना
चाहता है
मेरा वजूद
धरती से

मैं फिर भी
सोता हूँ
उसी छत के नीचे
इस विश्वास के साथ
यह देश
गाँधी का है।
3. सिर
मैं
घर से निकलते हुए
अपना सर
धड से
अलग कर हथेलियों पर
रख लेता हूँ।

पता नहीं
कब मैं
बस, ट्रक के
या फिर
किसी अमीरजादे की
कार केनीचे कुचला जाऊँ।

पता नहीं
कब मैं किसी
आतंकवादी विस्फोट का
शिकार हो जाऊँ।

इसलिए
जब मैं
घर आता हूँ
तब अपना सर
घड पर लगाकर
शाम को गिनता हूँ
पिरवार के सर।

कहीं किसी का सर
हथेलियों पर तो
नहीं रह गया।
4. बचपन
चैनलों की भीड
मोबाईल की चीख में
खो गया
म्ेरा गुल्ली-डण्डा
और
पहल-दूज
साथ में ले गया
सतालिया
और
कुरां डंडी।

बचा है अब शेष
आँखों पर चश्मा
पीठ पर भारी बस्त। 

माँ-बाप की
अति महत्त्वाकांक्षा का सपना।

अब देखता है
बचपन
चश्में के पीछे से
कैसा होगा
भविष्य का बचपन-
कैसा होगा- हमारा पचपन?
चित्र सौजन्य गूगल

5. अकेलापन
हर रोज
हर सुबह
हर बुढी काया को
दस से पाँच बजे तक
अकेलेपन की
भोगनी पडती है- असीम यंत्रणा
करें भी तो
किस से मंत्रणा।

जब घर के जवान स्त्री-पुरुष
चले जाते हैं
दफ्तर में
खेत में
खलिहान में
मिल में
रोटी की जुगाड में
और दो अंक सीखने
बच्चे स्कूल में

घर में पसरा रहता है
काट खाने को आतुर
केवल सन्नटा।
रहता है
इन्तजार
अपने नाती-पोतों का
साँझ ढले तक
लेकिन आते हैं जब
घर के सारे लोग
और टांग देते हैं सम्बन्धों
जैसे टांगते हैं बच्चे
अपने बस्ते
खूंटियों पर।

सब बतियाते हैं
टीवियों से
बीवियों से
और बूढे जिस्म
साँसों में उलझी
अपनी बेबस जिन्दगी से।
6. आतंकवाद
आतंकियों
क्यों ओढते हो बारूद
कहाँ से लाते हो
धुएँ से घुटे
बम की घुटन।

तुम क्यों
लेकर चलते हो
आतंक का
भूकम्प?

क्या
हो सकेगा
वो तुम्हारा
जो
आज मेरा घर
जला रहा है
कल
वह तुम्हारा
घर भी
ज्लाएगा।

बम का स्वभाव
सिर्फ और सिर्फ
जलाना है
घरों को
बसाना नहीं।
चित्र सौजन्य गूगल










नाम : नरेश मेहन
जन्म : 7 जुलाई, 1959 बीकानेर
शिक्षा : एम. ए. (हिंदी) एम. कॉम. (व्यवसायिक प्रशासन), श्रम कानून,
श्रम कल्याण एवं कर्मी-प्रबंधन में डिप्लोमा, पत्रकारिता एवं
जनसंचार में स्नातक, पुस्तकालय विज्ञान एवं प्रबंध में डिप्लोमा ।
प्रकाशन: पेड़ का दुख, घर (काव्य-संग्रह), खेजड़ी बुआ (बाल कहानियां)
कई मान-सम्मान व पुरस्कार प्राप्त ।
संप्तति : भारतीय खाद्य निगम, हनुमानगढ़ में सेवारत
पता : मेहन हाऊस, वार्ड नं. 14 हनुमानगढ़ (राजस्थान) भारत
फोन- 01552-268779 मोबाईल – 094143-29505

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24 Responses to नरेश मेहन की कविताएँ

  1. नरेश मेहन जी की सभी कविताएँ बहुत मर्मस्पर्शी और यथार्थपरक हें. शुभकामनाएँ !

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  2. नरेश जी कविता अपनी सादग़ी की वजह से अलग हो जाती है....उनकी कविता में और उन में सादग़ी बची रहे........

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  3. अनुभव के आँगन से निकली पाती
    जो शब्दों में ढलकर आ गयी है..

    मन को छू गयी आपकी कवितायेँ...नरेश मोहन जी बधाई
    आभार आपका...व्यास जी...

    ReplyDelete
  4. सभी कवितायें झंझोड देने वाली सोचने को विवश करती है।

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  5. sabhi rachnayen ek se badhkar ek lagi....

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  6. sari rachnaaye ek se badh kar ek hain....agar inhe ek ek kar ke prakashit kiya jata to acchha hota taki har rachna par alag se tippani ki ja sake.

    har rachna socho ko jhakjhor dene wali aur yatharthparak hai.

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  7. सरोकारों की कविताएँ हैं ....

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  8. किस रचना को चुना जाए ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है
    हर रचना स्वयं में मुकम्मल और उम्दा है चाहे वो ’आतंकवाद’हो ,’सिर’,,’अकेलापन” हो या ’बचपन’
    ्बधाई हो !!

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  9. सहज और सरल कविताएं हैं। पर थोड़ी कसावट की आवश्‍यकता है।

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  10. Sabhi rachnayen bahut marmsparshi lagi "patta"bahut hi pasnd aayi...bahut 2 badhai..

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  11. बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी रचनाएँ। बधाई

    ReplyDelete
  12. नरेश मेहन जी की सभी कविताएँ सहज और सरल हैं....बधाई....

    ReplyDelete
  13. PAPA KO PADH KE AISA LAGA KI MAIN HAMESHA SE UNHI KE AANGAN ME THI. ANANYA MEHAN

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  14. PAPA KO PADH KE AISA LAGA, KI MAIN HAMESHA SE UNHI KE AANGAN ME THI. ANANYA MEHAN

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  15. PAPA KO PADH KE AISA LAGA KI, MAIN HAMESHA SE UNHI KE AANGAN ME THI. ANANYA MEHAN

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  16. PAPA KO PADH KE AISA LAGA KI, MAIN HAMESHA SE UNHI KE AANGAN ME THI. ANANYA MEHAN

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  17. rachna mein yathaarth ka bahut sateek chitran hai jise har insaan mehsoos karta hai. bhaavpurn prastuti keliye Naresh ji ko badhai.

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  18. नरेश जी कविता अपनी सादग़ी की वजह से अलग हो जाती है....उनकी कविता में और उन में सादग़ी बची रहे........

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  19. bhai naresh ji. aapki rachnao ne dil ko choo liya. yese hi rachna path karte rhe, yhi dua h.

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  20. naresh ji. aapki kavitai dil ko chhoo gai. yese yi kavitai likhte rhe. subhkamnai

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  21. नरेश मेहन की समस्त कविताएं न केवल साधारण भाषा में लिखी गई हैं बल्कि सामान्य जनजीवन से जुड़ी हुई है। इस लिये इन कविताओं को सभी वर्ग के लोग पढ और समझ सकते है।

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  22. नरेश जी कविता अपनी सादग़ी की वजह से अलग हो जाती है....उनकी कविता में और उन में सादग़ी बची रहे........

    ReplyDelete
  23. वाह !
    प्रकृति के मर्म को उकेरने वाले मासूम मगर सजग कवि नरेश मेहन की इन शानदार कविताओं की प्रस्तुति के लिए "आखर कलश" परिवार साधुवाद का पात्र है ! समस्त कविताएं अंतर्मन को छूती हैं ! इन कविताओं में अपने परिवेश एवम मिट्टी की खुश्बू आती है ! अच्छी कविताओं के लिए नरेश मेहन को हार्दिक बधाई ! जय हो !

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  24. भाई नरेश मेहन की कविताओं का सच हमारे बहुत पास का यथार्थ है जिसमें हमारे सामने हमारी परंपराएं, संस्कार और आस्थाओं के साथ बहुत कुछ बदलता जा रहा है। कवि मेहन की रचनाओं में इस बदलते समय के जो मर्मस्पर्शी सामाजिक चित्र वे रेखांकित किए जाने योग्य है, एक पुरानी सर्वविदित बात यहां लिख रहा हूं कि सर्वाधिक कला वहां होती है जहां वह दिखाई नहीं देती.. अस्तु इतनी सरल, सहज और आत्मिक रचनाओं के लिए कवि और संपादक दोनों को बहुत-बहुत बधाई।
    www.drdaiya.blogspot.com

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