अपर्णा मनोज भटनागर की कविताएँ

अपर्णा मनोज भटनागर एक ऐसी रचनाधर्मी हैं जिनके काव्य में भावुकता शब्दों का जामा पहन अपने स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत होती है. शब्दरथि भाव, दर्द की की गहराई तक जाकर जब आकार पाते हैं तो पाठकमन स्वतः ही उन भावों के साथ बहता चला जाता है. आपके काव्य में परिष्कृत शब्दावली से युक्त शिल्प के साथ-साथ चिंतन और बोद्धिकता की प्रधानता भी रहती है जो कि चेतना को झकझोरने की क्षमता रखती हैं. आपका काव्य जब नव बिम्बों और उपमानो का जामा पहन पाठकों के समक्ष उपस्थित होता है तो पाठक सहज रूप से आबद्ध होता चला जाता है. ऐसी ही विलक्षण शब्दों और तीक्ष्ण भावों से सजी उनकी कुछ कविताएँ, जो अपने साथ ऐसे ही भावों, अनुभवों और नवीन प्रतीकों को सजाये हुए है, आपके समक्ष प्रस्तुत है..

नाविक मेरे

ये आज है
कल थक कर बिखर गया है
जैसे थक जाती है रात
और कई आकाशगंगाएं ओढ़ कर सो जाती है
एक तकिया चाँद का सिरहाने रख
सपनों पर रखती है सिर..
और सुबह की रूई गरमाकर
बिनौलों संग उड़ जाती है दूर दिशाओं के देश में
तब अपने आज पर
हरे कदमों संग तुम चल देते हो
जहां से बहकर आती है एक नदी
उसकी लहरों पर सुबह का पुखराज जड़ जाता है पीताभ
तुम इन लहरों पर उतार देते हो कल की नाव
आकाश के पंख काट देते हैं समय का पानी
और तुम आने वाले तूफ़ान पर खोल देते हो अपने पाल
मैं देखती हूँ
तुम्हारी नाव बो आई है
क्षितिज के कमल ,सफ़ेद - लाल
और तुम्हारे खुले हाथों ने पकड़ लिया है हवा को
अपने रुख के अनुकूल
कल के किनारे पर जा पहुंची है
तुम्हारी नाव ..
सखा , इस किनारे पर स्वागत हेतु
मैंने सजा रखी हैं सीपियों की बलुआ रंगोलियाँ ..
बचपन के घरौंदे
जिन्हें पैरों पर लादकर बैठी रहती थी विजित भाव से
तुम नाविक हो ..
लौट जाओगे जहां से फूटेगा प्रकाश
मैं रेत में पैर डाल
सजाऊँगी फिर एक किनारा
जहां तुम्हारी नौका लग सके ...अविराम !
***


शायद हो फिर प्लावन ...

सुनते हो !
सुनते हो!
हाँ , मैं सरस्वती ...!
एक प्लावन ही तो माँगा था !
तुमने दिया भी था ..
सहर्ष .
अपने पथरीलेपन में एक फिसलन-भर राह
कुछ फेनिल झागों के लिए नुकीली चट्टानें
छन सकूँ ... छन सकूँ ... छलनी -भर रेत
बंध सकूँ ..बंध सकूँ ..गठजोड़ किनारे
दूर तक दौड़ती दूब के पलक पाँवड़े
ढेर बुद्ध शांत प्रांतर में खड़े पेड़
लहरों पर तिरते चन्द्र -कलाओं के बिम्ब
सूरज की लहरों को छूता शीतल प्रवाह ...
अचानक क्या हुआ ?
क्या हुआ ?
कहीं कोई कुररी चीखीं ..
कोई क्रोंच रोया ...
न जाने क्या हुआ ..
तरलता मेरी मैदान बन गयी ..
टी ही हू.. टी ही हू ...
प्लावन मेरे तू दरक गया ..
कहीं गहरे
कहीं गहरे ..
दरकी चट्टानों में ..
सुना है मेरा रिसना कुआँ हो गया ...
क्रौंच तुम भी चुप हो ?
कुररी तुम ..?
किसी वाल्मीकि की प्रतीक्षा है क्या ?
मेरे मुहानों से कई वाल्मीकि गुज़र गए ..
तुमने देखा तो था ..
कोई रामायण ?
राम को सागर बाँधने दो ..
कोई तीर इस रिसाव पर लगेगा
शायद हो फिर प्लावन ...
***


रोटी

धूप तो कनक-कनक कर बरसती रही
तब भी जब तुम छाल की गर्माहट
और गुफाओं की सीलन सूंघ बसर करते थे ..
यही तो था -
तुम्हारे आदिम होने का पहला अहसास !...
तब अनजाने ये धूप बो आये थे तुम
और .. और... और
अचानक न जाने कितनी महक
खलिहान बन
तुम्हारी जन्म लेती सभ्यता से
फूट पड़ी
कलकल कर ...
और तब
बस तब बीहड़ में जन्म लेकर
हँसा था पहला गाँव .
तुमने अपने चकमक पर दागी थी
अपनी भूख ..!
तब भूखी थी सामूहिक भूख !
सो मिल-बाँट सो लिए थे
जी लिए थे ...
बस !तभी हाँ ,
तभी ..
इस नींद में स्वप्नों का अंतर
एक फासला ...तय कर गयी भूख !
अजब स्पर्धा दे गयी भूख !
अब रोटी की गोलाई कहीं चाँद है
तो कहीं ठन्डे तवे की गोल जलन !
पेट के छाले बन
दुखती है रोटी ..
रिसती है रोटी ..
और फिर यूँ ही करवट बदल सो जाती है .
कल की बाट है ?
या तेरे रंध्रों में पक रही कोई जिजीविषा ?
***
-अपर्णा मनोज भटनागर

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18 Responses to अपर्णा मनोज भटनागर की कविताएँ

  1. अपर्णा जी की कविताओं में एक अजीब सी अनुसंधान की प्रवृति आपको साफ़ दिखाई देगी..कुछ टटोलते हुये जैसे बरसात के मौसम में सीली, गीली लकडियों के बेपनाह गठ्ठर में किसी सूखी लकडी की खोज करती खुरदरेरी उंगलियां..अनम्यस्क भाव से बहती हुई धारा (कविता)..आप उसे दूर तक जाते देखते... रोटी की समीक्षा भी बडे अलग अंदाज़ में की गयी है. सादर

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  2. इस मंच की प्रतिष्ठा को और बढ़ाने के लिए अपर्णा जी को बधाई..

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  3. कवितायें अच्छी हैं…पर बीच-बीच में गैप बहुत ज़रूरी है वरना अर्थग्रहण दुष्कर हो जाता है। संभव हो तो एडिट करके यथास्थान गैप अवश्य दे दें। सादर

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  4. बेहद सुन्दर रचनाएं हैं प्रिय कवियत्री अपर्णा जी की | उनकी कविताओं की बात ही सबसे जुदा है .. और आपकी पोस्ट रंग सयोजन, सेट्टिंग, डिजाइनिंग भी शानदार है ... आपकी यह पोस्ट कल चर्चामंच पर होगी ... आप भी वह आ कर अपने विचारों से अवगत करवाएं

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  5. इन कविताओं को आत्मसात कर,
    इनके रस में निमग्न होना ,अपने आप में -अद्भुत अनुभव है !
    सुन्दर रचनाओं के लिए बधाई !

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  6. अपर्णा लगातार बेहतर कर रही हैं.

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  7. lajbaba

    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें....

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  8. एक फासला ...तय कर गयी भूख !
    अजब स्पर्धा दे गयी भूख !
    अब रोटी की गोलाई कहीं चाँद है
    तो कहीं ठन्डे तवे की गोल जलन !
    पेट के छाले बन
    दुखती है रोटी ..
    रिसती है रोटी .

    बहुत ही गहरी भावानुभूति

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  9. kavitaen pasand karne ke liye aap sabhi ka aabhar!

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  10. sabhi rachnaayen bahut achhi aur bhaavpurn hai, shubhkaamnaayen aparna ji.

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  11. अपर्णा जी ...कोटि कोटि नमन....
    बहुत सुन्दर मन को अंतर तक स्पर्स करती रचना ..रोटी / पेट की भूख ने जीवधारियों में कितना संघर्ष विकसित किया ..मानवीय सम्वेदाओं को कहाँ से कहाँ पहुंचाया ...कितनी कोमलता थी ...
    तभी ..
    इस नींद में स्वप्नों का अंतर
    एक फासला ...तय कर गयी भूख !
    अजब स्पर्धा दे गयी भूख !
    अब रोटी की गोलाई कहीं चाँद है
    तो कहीं ठन्डे तवे की गोल जलन !
    पेट के छाले बन
    दुखती है रोटी ..
    रिसती है रोटी ..
    सादर अभिनन्दन !!!
    श्रीप्रकाश डिमरी

    ReplyDelete
  12. अपर्णा जी नमस्कार
    आपकी रचना नाविक मेरे को पढ़ा जितने शानदार तरीके से आत्मा भाव को जाग्रत करने उसकी सामर्थ्य से स्वयं को परिचित करने तथा आने वाले कल का स्वागत नई रचना के लिए प्रेरित करना वाकई खुबसूरत लाजवाब काबिले तारीफ
    बहुत बहुत धन्यवाद् साधुवाद क़ीपत्र हैं मेरी और से शुभकामनायें
    मार्कंडेय Ranga

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  13. अपर्णा जी कोटि कोटि अभिनन्दन ..बहुत ही ससक्त रचना ..सचमुच आदिम सामूहिक होते होते ..मिलबांट कर खाने वाली भूख से कब इतनी अकेली हो गयी...
    बस !तभी हाँ ,
    तभी ..
    इस नींद में स्वप्नों का अंतर
    एक फासला ...तय कर गयी भूख !
    अजब स्पर्धा दे गयी भूख !

    ReplyDelete
  14. tumhari kavita jese koyi samndr ki garayi .......
    tumhare ahsas jese bhitr ki antdhniyo ko milta sukh ...........tumhare in ahsaso or bhavo ne kayl bana diya ........
    mere dher sari duaaye or shubhkamneye arpna ji ko

    ReplyDelete

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