जन्माष्टमी महोत्सव

आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी के इस पावन दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ! श्री कृष्ण की कृपा से आप और आपका परिवार सभी सुखी हो, मंगलमय हों, ऐसी प्रभु श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हैं. कृष्ण जन्मोत्सव को धूमधाम से मनाने के प्रयोजनार्थ आप सभी के लिए प्रस्तुत है रश्मि प्रभा, कविता किरण, संगीता सेठी, जया केतकी और सुनील गज्जाणी द्वारा सजाई 'जन्माष्टमी विशेषांक' के रूप में श्री कृष्ण की विभिन्न झाँकियाँ!

कृष्ण जन्म


सूरदास ले बाल-रूप
यशोदा ले माखन
अतृप्त ममता का प्यार
लिए खडी है देवकी
गागर भरकर गोपियाँ
प्रेम रंग में उधो
गर्व लिए वासुदेव और नन्द
प्रतीक्षित मंद मुस्कान संग राधा
जोगन बनी मीरा
सब हैं मगन रंग
जन्म लीला करने को आए
कृष्ण बांसुरी के संग

बांसुरी की धुन में गाओ सब मिलकर
जनम लियो कृष्ण अवतार लेकर
होगा चमत्कार
आयेंगे इन्द्र मेघ समूह लेकर
यमुना फिर झूमेगी
धरती भी झूमेगी
किसान झूम-झूम गायेंगे
खेत लहलहाएंगे
आए कृष्ण घुटने पर
बादलों का राग लिए
विद्युत - सी शोभा लिए
मुसलाधार बारिश लिए -- -

भीगी-सी काया लिए
मैं बनी यशोदा
दुलारा है ललना को
लगाया है काजल
'यदा यदा ही धर्मस्य ....' की गूँज है
बारिश की बूंदों में
ब्रह्माण्ड मेरी गोद में
प्रकृति इतराई है

गोकुळ के भाग खुले
दसो दिशी द्वार खुले
कलयुग की धरती पर
कृष्ण के पाँव पड़े
***

प्रभु तुम और मैं !


कस्तूरी मृग बन मैंने ज़िन्दगी गुजारी
प्रभु तुम तो मेरे अन्दर ही सुवासित रहे !
मैं आरती की थाल लिए
व्यर्थ खड़ी रही
प्रभु तुमतो मेरे सुकून से आह्लादित रहे!
मेरे दुःख के क्षणों में
तुमने सारी दुनिया का भोग अस्वीकार किया,
तुम निराहार मेरी राह बनाने में लगे रहे
और मैं !
भ्रम पालती रही कि -
आख़िर मैंने राह बना ली !
मैं दौड़ लगाती रही,
दीये जलाती रही
- तुम मेरे पैरों की गति में,
बाती बनाती उँगलियों में स्थित रहे !
जब-जब अँधेरा छाया
प्रभु तुम मेरी आंखों में
आस-विश्वास बनकर ढल गए
और नई सुबह की प्रत्याशा लिए
गहरी वेदना में भी
मैं सो गई -
प्रभु लोरी बनकर तुम झंकृत होते रहे !

.............
प्रभु तुमने सुदामा की तरह मुझे अनुग्रहित किया
मुझे मेरे कस्तूरी मन की पहचान दे दी !

- रश्मि प्रभा


ओ साँवरिया!

कैसे काटूं ये कोरी कुआँरी उमरिया
ओ सांवरिया!
अब तो अधरों पे धर ले बनाके बाँसुरिया
ओ सांवरिया!

राह तकते नयन मेरे पथरा गये
आ गये सामने तुम तो घबरा गये

लाज के मारे मर ही न जाए गुजरिया
ओ साँवरिया!

बिन तेरे ब्रज की गलियाँ भी सूनी लगे
है जरा-सी मगर पीर दूनी लगे

फोडने आ जा पनघट पे छलके गगरिया
ओ साँवरिया!

रास संग गोपियों के रचाई नहीं
नींद कितने दिनों से चुराई नहीं

आ जा जमना किनारे पुकारे बावरिया
ओ साँवरिया!
कर दे बेसुध मोहे मुरली की तान से
जान चाहे चली जाए फिर जान से

आके ले ले ओ निर्मोही मोरी खबरिया
ओ साँवरिया!

बाग में पेड पर पक गये आम हैं
दूर मेरी नजर से मेरे ष्याम हैं

द्वार पे है लगी कब से प्यासी नजरिया
ओ सांवरिया!

जीत पाया नहीं जो हृदय श्याम का
राधिके! रूप तेरा ये किस काम का

मुँह चिढाए मोहे सूनी-सूनी सजरिया
ओ साँवरिया!

कैसे काटूं ये कोरी कुआँरी उमरिया
ओ साँवरिया!
अब तो अधरों पे धर ले बनाके

-कविता किरण

नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

वर्षा है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। खुशी के मारे यमुना जी उप न कर वसुदेव की टोकरी में लेटे कन्हैया के चरण चूमने का प्रयास कर रही है। कल्पना करते ही यह सारा का सारा दृश्य मेरी आंखों के सामने चल चित्र की तरह घूम गया। श्रावण मास की पूर्णिमा जिसे हम रक्षा बंधन के रुप में मानते है। उसके ठीक आठवे दिन कृष्ण जन्म महोत्सव पूरे भारत देश म धूमधाम के साथ मनाया जाता है “ जनमाष्टमी “ का प्रमुख उत्सव मथुरा और वृन्दावन में होता है। पॉराणिक कथाओं के अनुसार धरती पर बढ रहे अपराधों ओर अत्याचारों को मिटाने के लिए द्वापर युग में विष्णु ने कृष्ण के रुप में अवतार लिया। जिन परिस्थितियों में कृष्ण ने जन्म लिया वे बडी विकट थी मथुरा में कंस की दुष्टता दिनों-दिन बढती जा रही थी। उसकी अत्याचारों से त्रस्त जनता भगवान से नित्य प्रार्थना करने लगी। एक दिन आकाशवाणी हुई कि देवकी और वसुदेव की आठवी संतान कंस का सर्वनाश करेगी। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को करागार में बंदी बना कर रख दिया। अब उनकी जो भी संतान होती उसे कंस मार डालता। परन्तु देवकी और वसुदेव ने यह निश्चय कर लिया था। कि वे अपनी आठवी संतान को जरुर बचायेंगे। जैसे ही कृष्ण का जन्म हुआ बसुदेव उन्हें बांस की डलिया में छिपाकर नंदगाव ले आए और नंदबाबा के घर दे आए।

नंद बाबा ने उस बालक को रख लिया तथा अपने घर जन्मी कन्या को वसुदेव जी को दे दिया। जब कंस ने यह खबर सुनी कि देवकी ने आठवी संतान को जन्म दिया है तो वह कारागारकी ओर दोडा और जैसे ही उसने बच्ची को मारने के लिए उठाया वह कंस के हाथ से छूटकर देवी के रुप में प्रकट हुई और हंसते हुए बोली हे दुष्ट तुझे मारने वाला-कही और जन्म ले चुका है और अंतर्ध्यान हो गई।

बालपन से ही कृष्ण गोकुल वासियों के मनमोहन थे, उनके ह्दय की धडकन थे। उन्हें माखन और दही बहुत प्रिय था। वे नित नई बाल लीला से नंदगांव के निवासियों को लुभाते । कृष्ण ने अनेक असुरों का नाश किया। तथा ब्रज के वासियों को विपदाओं से बचाया। कृष्ण के जन्म को मनाने के लिए पूरे श्रावण मास से झूलनोंत्सव और रासलीलाएं आयोजित की जाती है। आज के समय में मटकी से दही भरकर काफी ऊंचाई पर टांगते है। जिसे बिना किसी सहारे के एक समूह के लोग एक के ऊपर एक स्तंभ रुप में चढते है और उस मटकी को फोडते हंंै। जो समूह विजेता होता हैं उसे इनाम दिया जाता है जिन शहरों में इस प्रकार की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है उस शहर के प्रतिष्टित नागरिक तथा व्यापारी वर्ग इनाम घोषित करते है। यह एक मनोरंजन दृश्य होता है।

कृष्ण मंदिरों में पूरे मास सतसंग रासलीला तथा गोपाल काला आदि का आयोजन किया जाता है। जम्माष्टमी के दिन श्रद्धालु दिनभर उपवास करते है तथा मंदिर में या अपने घर में रात १२ बजे कृष्ण जन्म मनाते हैं। घर में अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान, दूध, दही से उन्हें भोग लगाते है। फिर भोजन करते है।

कृष्ण जन्माष्टामी का महत्व बताने के लिए शालाओं और मन्दिरों में कृष्ण के समय और लीलाओं की झांकिया लगाई जाती है। जिसमें यमुना किनारे गेंद खोलने का दृश्य, माखन चुराने का दृश्य, कालिया नाग से लडाई का दृश्य, गोर्वधन पर्वत उठाये हुए कृष्ण तथा रासलीला के दृश्य प्रमुख होते है।

-जया केतकी

रुक्मिणी और राधा:सम्पूर्ण जीवन दर्शन
जब-जब रुक्मिणी और राधा का नाम एक साथ आते है तो जेहन में एक तस्वीर सामने दिखाई देती है वो कृष्ण की होती है ।क्योंकि चराचर जगत में रुक्मिणी और राधा का सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है । रुक्मिणी श्रीकृष्ण की पत्नी और राधा श्रीकृष्ण की प्रेमिका के रूप में जानी जाती है । आम जगत में रुक्मिणी और राधा की यही पहचान है । इसी दृष्टिकोण से जब आम आदमी देखता है तो श्रीकृष्ण का आलोचक बन जाता है । परंतु श्रीकृष्ण तत्व के दर्शन पर जाएँ बेहद खूबसूरत मींमांसा नज़र आती है । रुक्मिणी को देह और राधा को आत्मा माना है । श्रीकृष्ण का रुक्मिणी से सम्बन्ध दैहिक और राधा से सम्बन्ध आत्मिक माना है ।
रुक्मिणी और राधा का दर्शन बहुत गहरा है । इसे सम्पूर्ण सृष्टि के दर्शन से जोड़कर देखें तो सम्पूर्ण जगत की तीन अवस्थाएँ हैं :-
• स्थूल
• सूक्ष्म
• कारण
स्थूल जो दिखाई देता है जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं और हाथों से छू सकते हैं वह कृष्ण-दर्शन में रुक्मणी कहलाती है । सूक्ष्म जो दिखाई नहीं देता और जिसे हम ना आँखों से देख सकते हैं ना ही स्पर्श कर सकते हैं , उसे केवल महसूस किया जा सकता है वही राधा है और जो इन स्थूल और सूक्ष्म अवस्थाओं का कारण है वह है श्रीकृष्ण और यही कृष्ण इस मूल सृष्टि का चराचर है । अब दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो स्थूल देह ,और सूक्ष्म आत्मा है । स्थूल में सूक्ष्म समा सकता है परंतु सूक्ष्म में स्थूल नहीं । स्थूल प्रकृति है और सूक्ष्म योगमाया है और सूक्ष्म आधार शक्ति भी है लेकिन कारण की स्थापना और पहचान राधा होकर ही की जा सकती है । यदि चराचर जगत में देखें तो सभी भौतिक व्यव्स्थाएँ रुक्मणी और उनके पीछे कार्य करने की सोच राधा है और जिनके लिए यह व्यवस्थाएँ की जा रही हैं और जिनके लिए यह व्यव्स्थाएँ की जा रही हैं वो कारण है। स्थूल की स्थिति में आना बेहद आसान है यानि रुक्मणी बनना बेहद आसान है लेकिन सूक्ष्म की स्थिति विरल बन कर ही पाई जा सकती है यानि दैहिक तत्त्वों से परे गल कर ही पाई जा सकती है । श्रीकृष्ण के प्रशंसक उनका नैतिक समर्थन करते हुए कहते है कि क्या हुआ यदि उनके सम्बन्ध रुकमणी से भी थे और राधा से भी । श्रीकृष्ण में वो क्षमता भी थी कि वो देह बनकर भी जीते और आत्मा बनकर भी । ऐसी क्षमता हर किसी में होना सम्भव नहीं । और रुक्मिणी और राधा का पूरा दर्शन साकार हो जाता है ।

-संगीता सेठी

हे ! कृष्ण

हे ! कृष्ण
मैं तुम्हे आज भजन
नहीं सुनाउगा
ना ही साष्टांग करूँगा
हे ! कृष्ण
तुमसे से हालत क्या छिपे है
फिर भी निष्ठुर बने हो
क्यूँ वंदन करू तुम्हे
तुम ही बताओ ?

पीड़ित मेरा रोम रोम
हर पौर सुलग रहा है
क्यूँ ?
उत्तर है !हाथ हाथ को खा रहा है
पाँव पाँव को कुचल रहा है

दृष्टी!
दृष्टी भेद करती है द्रश्य देखने में
जब कि
मस्तिष्क !
ह्रदय !
नियंत्रित रखता हूँ
यथा स्थान उपयोग करता हूँ
फिर भी भय क्यूँ ?
मेरे अपने ही मुझे प्रताड़ित
करते है
हे ! कृष्ण

उत्सव है आज तुम्हारा आज
तुम्हारे
अवतार का असंख्य भीड़ है
तुम्हारे देवालाओं के आगे
और किस भाव से
तुम्ही जानो !
संभव होतो सब दो उन्हें
परन्तु
सद्भुधि !
विवेक !
भी प्रदान करना
मेरी अरदास है
हे ! कृष्ण

कोई नस्ल नहीं
ना कोई धर्म
मैं नहीं मानता
तो फिर
धर्म , जाति पे
जेहाद
अलगाववाद क्यूँ ?
हे ! कृष्ण
घर बटा है सदा
आँगन नहीं
परन्तु कृष्ण
मैं तो आँगन हूँ
और
मेरा बटवारा
हे ! कृष्ण
तुम्ही बताओं
क्या ये सही है ?
नित्य स्वयं से
मंथन करता हूँ
विष ही पीना पड़ता है
दुःख हरो
हे ! कृष्ण
रास रचो फिर कोई
फिर एकीकार हो
मंगल गान हो !

हे ! कृष्ण
सुन रहे हो ना मेरी अरदास ?
अपने अधरों कि मुस्कान
मुझे भी बाँट दो ना
प्रतीक्षा है !
वेदना ही भजन है मेरा
अश्रु छलक पड़गे मेरे
हे ! कान्हा
तुम हो मुझे में ही बसे
परन्तु
और ज्ञान दो
दिशा दो !
मैं अर्जुन कि भांति
संबल दो
हे ! कृष्ण !

उत्सव है
आज तुम्हारा
ऐसा कुछ वरदान दो
एक बार फिर गीता ज्ञान दो !

-सुनील गज्जाणी









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21 Responses to जन्माष्टमी महोत्सव

  1. गोकुळ की इतनी खूबसूरत साज सज्जा ....... यहाँ तो कृष्ण के हर मनभावन रूप हैं , बस अपलक निहारना है, बांसुरी की धुन में मगन होना है

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  2. बहुत सुन्दर झांकियां ...सारी रचनाएँ उच्च स्तर की ....सबको बधाई ...

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  3. सुन्दर झांकियों से सजी ज्ञानवर्धक पोस्ट...
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  4. बहुत ही सुन्दर झांकियां ...रचनाएँ एक से बढ़कर एक हैं ..थोड़ी फुर्सत से पढना होगा ...

    जन्माष्टमी की बहुत शुभकामनायें ...!

    ReplyDelete
  5. kavita ji ki kavita padhkar Bansuri bajne lagi krishn ki.
    Bahut badhiya.
    Puri team ko badhai.

    ReplyDelete
  6. kavita ji ki kavita padhkar Bansuri bajne lagi krishn ki.
    Bahut badhiya.
    Puri team ko badhai.

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  7. आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
    बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!

    ReplyDelete
  8. आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
    बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!

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  9. सभी के भाव और रचनायें एक से बढकर एक हैं।

    कृष्ण प्रेम मयी राधा
    राधा प्रेममयो हरी


    ♫ फ़लक पे झूम रही साँवली घटायें हैं
    रंग मेरे गोविन्द का चुरा लाई हैं
    रश्मियाँ श्याम के कुण्डल से जब निकलती हैं
    गोया आकाश मे बिजलियाँ चमकती हैं

    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

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  10. आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
    बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!

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  11. गोकुळ कहो या वृन्दावन या द्वारिका... हमारा कान्हा तो सबके दिल में बसा है | कितने उसके रूप, फिर भी अरूप ! यही तो उनकी लीला है | "आखर कलश" हमेशा अच्छी रचनाओं को प्रकाशित करता रहा है | पिछले कुछ दिनोने से संपादक श्री नरेन्द्र व्यास ने बड़ी मेहनत और लगन से ब्लॉग की खूबसूरती बढ़ाई है | आप सबकी कलम ने उन खूबसूरती को फूलों से सजाया है | आपकी प्रेरणा हमारा मनोबल बढ़ती है | हम आगे भी विविध विधाओ पर, उत्सवो पर विशेषांक करेंगे | आप सब को "आखर कलश" परिवार की हार्दिक शुभकामना और जयश्री कृष्ण |

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  12. श्री कृष्ण जन्माष्ठमी की बहुत-बहुत बधाई, ढेरों शुभकामनाएं!

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  13. radha evam rukmini dono hi krishna ko utne hi pyare hai .mere anusar [halaki mai ek sadharan vyakti hu ] radh ka sambandh vishuddha atmik evam prem satwik hai jabki rukmini ka prem sansarik evam vyavharik hai .dono baraber evam ek doosere se 180 degree per hai .sabhi rachnaye sunder hai

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  14. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आज आखर-कलश के पृष्ठ बहुत ही मनभावन लग रहे हैं। भावपूर्ण कविता, आलेख और मनोहारी चित्रों से सजे आज के इस आयोजन के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें। सभी को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं।

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  15. आखर कलश का यह अभिनव आयोजन बहुत सुंदर लगा। बहुत बहुत बधाई।

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  16. सुन्दर पोस्ट.
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

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  17. मुझे अत्यन्त हर्ष हुआ इस ब्लोग को पढकर ......

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  18. कृष्ण के जीवन की अद्भुत छटाओं को जो सामूहिक कलात्मक अभिव्यक्ति मिली है .आप सभी रचनाकार बधाई के पात्र हैं .

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  19. bahut khubsurat, ek se badh kar ek.......badhai!!

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