फ़ज़ल इमाम मल्लिक की कविता - बराबर के मुकबाले में

रचनाकार परिचय

नाम- फ़ज़ल इमाम मल्लिक

जन्म- 19 जून, 1964 को बिहार के शेखपुरा जिला के चेवारा में।
पिता/माता-  जनाब हसन इमाम और माँ सईदा खातून।
शिक्षा- स्कूली शिक्षा श्री कृष्ण उच्च विद्यालय, चेवारा (शेखपुरा)। इंटर रांची युनिवसिर्टी के तहत रांची कालेज से । ग्रेजुएशन भागलपुर युनिवसिर्टी के रमाधीन कालेज (शेखपुरा)। व्यवसायिक शिक्षा पटना के आईआईबीएम से होटल प्रबंधन में पोस्ट ग्रेजुएशन।
लेखन-  उर्दू और हिंदी में समान रूप से लेखन। लघुकथाएँ, कविता, कहानी, समीक्षा और सम-सामयिक लेखन। साहित्य-संस्कृति पर नियमित लेखन।
पत्रकारिता- लंबे समय से पत्रकारिता। 1981 से जनसत्ता में बतौर खेल पत्रकार करियर की शुरुआत। इससे पहले सेंटिनल (गुवाहाटी), अमृत वर्षा (पटना), दैनिक हदिुंस्तान (पटना) और उर्दू ब्लिट्ज (मुंबई) से जुड़ाव। बतौर खेल पत्रकार विश्व कप क्रिकेट, विश्व कप हाकी, एकदिवसीय व टैस्ट क्रिकेट मैचों, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय फुटबाल मैचों, राष्ट्रीय टेनिस, एथलेट्किस वालीबाल, बास्केटबाल सहित दूसरे खेलों की रिपोर्टिंग।
इलेक्ट्रानिकमीडिया- एटीपी चैलेंजर टेनिस, राष्ट्रीय बास्केटबाल, कोलकाता फुटबाल लीग, राष्ट्रीय एथलेटिक्स का दूरदर्शन के नेशनल नेटवर्क पर लाइव कमेंटरी। कविताएँ-इंटरव्यू दूरदर्शन पर प्रसारित। आकाशवाणी के लिए लंबे समय तक सहायक प्रोड्यूसर (अंशकालिक) के तौर पर काम किया। कविताएँ-कहानियाँ कोलकाता व पटना, गुवाहाटी के आकाशवाणी केंद्र से प्रसारित।
 प्रकाशन- लधुकथा संग्रह मुखौटों से परे और कविता संग्रह नवपल्लव का संपादन।
 संपादन- साहित्यक पत्रिका श्रृंखला व सनद का संपादन।
सम्मान- साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कवि रमण सम्मान, रणधीर वर्मा स्मृति सम्मान, सृजन सम्मान और रामोदित साहु सम्मान।
संप्रति- जनसत्ता में वरिष्ठ उपसंपादक।
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कभी-कभी ही कोई तारीख़
बन जाती है इतिहास
और याद रह जाती है सालों तक
ठीक 9/11 की तरह
हालांकि उस दिन न सरकारें बदलीं
न कहीं बगावत हुई
न ही ऐसा कुछ घटा
जिससे दहल जाती दुनिया
लेकिन फिर भी सत्ताइस जून की तारीख़
एक इतिहास की तरह गड़ गई
अमेरिका के सीने में
जिसे अमेरिका चाह कर भी
इतिहास के पन्नों से अलग नहीं कर पाएगा
एक तारीख़ फिर बनी इतिहास
और सुपर पावर के सीने पर
छोड़ गई अपनी धमक

यह भी इतिहास है कि
पहले मैदानों पर लड़ी जाती थी लड़ाइयां
लेकिन अब ऐसा नहीं होता
जंग अब थोपी जाती है छोटे देशों पर
और सुपरपावर बन कर दुनिया को धमकाने के लिए
दी जाती है जंग की धमकी
जंग अब मैदानों पर नहीं
जंग व्हाइट हाउस से लड़ी जाती है
और छोटे देशों पर
दागे जाते हैं मिसाइल
अपनी दादागिरी के लिए
भेजे जाते हैं बेड़े
और विमानों से गिराए जाते हैं बम
मैदानों का सारा गणित बदल गया है
और भूमिका भी

मैदानों पर अब खेले जाते हैं खेल
जहां हथियारों के बिना होते हैं
बराबर के मुकाबले
मजबूत और कमज़ोर खिलाड़ियों को मिलते हैं
जीतने के लिए बराबर के मौक़े
मैदानों पर न गोलियां चलती हैं
न मिसाइल का होता है डर
न होते हैं टैंक
और न ही तनी होती हैं बंदूक़ों की नलियां
लेकिन फिर भी लड़ी जाती है जंग
कला से, कौशल से, ताक़त से और रणनीति से
खेल के मैदान पर कोई ‘मित्र देश’
किसी की मदद को नहीं आता
बस दो ही टीमें होती हैं आमने-सामने
सुपर पावर अमेरिका हो या फिर छोटा सा देश घाना
अपने-अपने कला-कौशल से
जीत के लिए उतरते हैं मैदानों पर
किसी बाहरी ताक़त की मदद के बिना
इसलिए खेल के मैदानों पर
कभी-कभी बनता है इतिहास
और कोई-कोई तारीख़
बन जाती हैं इतिहास

दक्षिण अफ्रीका के स्टेनबर्ग स्टेडियम पर
विश्व कप फुटबाल में
सत्ताइस जून को घाना ने रचा इतिहास
सुपर पावर अमेरिका को फतह कर
उसने दिखाई थी अपनी ताक़त
फुटबाल के मैदान पर
न मिसाइलें चलीं
न राकेट दागे गए
न आसामानों पर दनदनाते रहे अमेरिकी वायुसेना के विमान
बस था तो फुटबाल का जनून और
कुछ कर गुजरने की ललक
जिसने रातोंरात घाना को
दुनिया के नक्शे पर ला खड़ा किया

आरपार के इस मुक़ाबले में
काले-कलूटे खिलाड़ियों ने
अपने से कहीं ताक़तवर मुल्क को
हर तरह से टक्कर दी
और अतिरिक्त समय में खिंचे इस मैच में
तेज़ तर्रार स्ट्राइकर असामोह ग्यान ने
मध्य पंक्ति से उछाली गेंद को
अमेरिकी हाफÞ में अपनी छाती पर उतारा था
और फिर बाएं फ्लैंक से तेज़ फर्राटा लगाता हुआ
अमेरिकी डिफेंस को छकाते हुए
बाक्स के ठीक ऊपर से
बाएं पांव से दनदनाता शाट लगा कर गोल भेद दिया था
अमेरिकी गोलची कुछ समझता
गेंद इससे पहले ही जाल के बाएं कोने में उलझी नाच रही थी
और घाना इस गोल का जश्न मना रहा था
हताश, मायूस अमेरिकी
जाल में तैरती गेंद को
बस देख भर रहे थे
इस एक गोल से घाना इतिहास का हिस्सा बन गया था
और अमेरिका हार कर
मुक़ाबले से बाहर हो गया था

आमने-सामने और बराबरी की लड़ाई में
व्यक्ति हो या देश
सुपर पावर की आंखों में आंखें डाल कर
उसकी बाहें मरोड़ कर
उसे मुक़बाले से बाहर कर देता है
जैसा उस दिन घाना ने किया था

कभी-कभी ही कोई तारीख़
बन जाती है इतिहास
और याद रह जाती है
सालों तक

***
संपर्क-
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

4-बी, फ्रेंड्स अपार्टमेंट्स, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092।

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18 Responses to फ़ज़ल इमाम मल्लिक की कविता - बराबर के मुकबाले में

  1. एक खेल तारीख जो अमेरिका को खली
    दूसरी खेल तारीख घाना ने खलाई
    दोनों जगह अमेरिका ही हारा भाई।

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  2. एक विचारोत्तेजक कविता ! फ़ज़ल साहिब आपने ठीक फरमाया, अब जंग के समीकरण बदल गए हैं।

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  3. good work by aakhar kalash towards hindi sewa mission

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  4. कविता समय चक्र के तेज़ घूमते पहिए का चित्रण है। कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

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  5. फ़जल भाई, आपकी कविता स्‍पष्‍ट विचार लिये हुए है और बधाई के काबिल है लेकिन एक बात जो मुझे खटक रही है वह है इसकी लंबाई। यूँ तो कविता की कोई निश्चित लंबाई निर्धारित नहीं है लेकिन अब समय आ गया है फ़ास्‍ट फ़ूड का और कविता भी दिमाग़ के लिये भोजन का ही एक रूप है इसलिये अब अपेक्षा रहती है कि कविता आये, सीमित शब्‍दों में अपनी बात कहे और आनंद लेने या सोचने के लिये छोड़ जाये।

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  6. प्रिय भाई फजल, धूमिल ने कभी कहा था कि कविता एक सार्थक बयान है लेकिन बाद में आलोचकों ने उनके बयान को खारिज कर दिया. आप का यह सार्थक बयान पढ़कर अच्छा लगा लेकिन इसे कविता कहने में थोडा संकोच होता है. यह कविता हो न हो लेकिन आजकल सार्थक बयान भी तो बहुत कम दिखते हैं. सचाई बयान करने के लिये बधाई.

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  7. आवश्यकता अनुसार कविता लम्बी भी हो सकती है लेकिन यहाँ कविता की लम्बाई इसके मूल भाव की वाहवाही लूटे जा रही है.

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  8. imam sahb apne apni baat ko kavita ke sanche jis khubsurt andaz me paish ki h us ke liye mubarakbad

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  9. मल्लिक साहब, आपकी सोच आपके शब्‍दों से मुखरित हुई है, आपकी कविता में वक्‍त की सच्‍चाई बेपर्दा है, शतरंज के मोहरों के समान बने छोटे देश बडे खिलाडियों के हाथों में खेलने को विवश हैं, बन्‍दरों के झगडे में बिल्लियों ने सदा ही रोटी खाई है,अविश्‍वास के कुए में धंसे तीसरी दुनिया के बासिन्‍दे हक्‍केबक्‍के हैं, उनका ना कोई तारनहार है और ना ही दूर तक साहिल नजर आता है, आपकी कविता की रोशनी में किसी को रास्‍ता मिलेगा यही आशा है, एक बार पुन बधाई ऐसी बेहतरीन रचना के लिए

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  10. अमेरिकी गोलची कुछ समझता
    गेंद इससे पहले ही जाल के बाएं कोने में उलझी नाच रही थी
    और घाना इस गोल का जश्न मना रहा था

    यह खेल अभूतपूर्व था जो सालों साल याद किया जाता रहेगा ......साथ ही इस पर लिखी इस तरह की कवितायेँ भी इतिहास का एक हिस्सा होंगीं ......

    फ़जल इमाम जी बधाई .....!!

    ReplyDelete
  11. अमेरिकी गोलची कुछ समझता
    गेंद इससे पहले ही जाल के बाएं कोने में उलझी नाच रही थी
    और घाना इस गोल का जश्न मना रहा था

    यह खेल अभूतपूर्व था जो सालों साल याद किया जाता रहेगा ......साथ ही इस पर लिखी इस तरह की कवितायेँ भी इतिहास का एक हिस्सा होंगीं ......

    फ़जल इमाम जी बधाई .....!!

    ReplyDelete
  12. Rachana behad sashakt hai,par haan,lambai zara-si adhik lagi. Yah bhi sach ki,taareekh aur itihaas kaa aisa warnan kabhi nahi padha!

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  13. फ़जल भाई आपकी लघुकथाएं एक जमाने में खूब पढ़ीं हैं। यह कविता सचमुच वर्तमान का एक बयान है। सच तो यह है कि बयान पढ़ने और सुनने के लिए धीरज चाहिए होता है। अगर हमारे पास धीरज नहीं होगा तो हम इस बयान को आत्‍मसात ही नहीं कर सकेंगे। बधाई। और सुनील जी का इस कविता से रूबरू कराने के लिए।

    ReplyDelete
  14. फ़ज़ल साहब समय की रफ़्तार से वाकिफ़ है ... बहुत सामयिक लिखा है ....
    पर जहाँ ९/११ एक तारीख है वहीं २६/११ बस दर्द का इतिहास

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  15. मित्रों,
    कविता पर आप लोगों की टिप्पणी पढ़ कर अच्छा लगा। कोशिश भर थी अपनी बात को सामने रखने की। मैं नहीं जानता यह कविता है यह नहीं, यह काम आलोचकों का है। मेरा काम लेखन है। बस यह समझ कर कि ‘शायद कि उतर आए तेरे दिल में मेरी बात’ कुछ लिखता हूं। बस।
    हालांकि लंबी कविताएं नहीं लिखता हूं। लेकिन यह कविता लंबाई की मांग करती थी, इसलिए कविता लंबी हो गई। तमाम मित्रों का आभार, जिन्होंने टिप्पणी की। उनका भी आभार जिन्होंने कविता पढ़ी।

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  16. यार फजल! विषय तो काफी गंभीर है और तुम ने अपनी बात ढंग से कही भी है जो सोचने पर उकसाती है. मगर तुम्हें इस बात का खुद अहसास है कि लम्बाई कुछ ज़ियादा हो गई है इस लिए मैं कुछ नहीं कहूँगा. हाँ इतना ज़रूर कहूँगा कि तुम्हारी रचनाएँ आखर कलश पर आइन्दा भी नज़र आती रहनी चाहियें.

    ReplyDelete

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