संजय पुरोहित की तीन कविताएँ

रचनाकार परिचय
नाम: संजय पुरोहित
पिता का नाम: श्री बुलाकी दास 'बावरा'
संजय एक कवि तथा कथाकार हैं तथा वर्षो से एंकरिंग करते रहे हैं | आपकी हिंदी कहानियो की एक पुस्तक 'कथांजलि' नाम से प्रकाशित हुई है | हजार से अधिक टीवी, रेडियो, स्टेज आदि कार्यक्रमो में संचालन भी कर चुके हैं जो वर्तमान में अनवरत रूप से जारी है | हिंदी, राजस्थानी और अंग्रेजी में लगातार लिखते रहे हैं | आपकी दूसरी पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य है
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कोई तो है.....
कोई तो है जो
सहला जाता है,
मेरी यादों के श्वेत पखेरूओं को,
और कह जाता है,
मेरी अकहे भावों को

कोई तो है जो
छेड जाता है,
मेरे हिय दिव्य संतूर को,
और तरंगा जाता है
कोई मधु राग

कोई तो है जो
बिठला जाता है
कृति आतुर शब्दों को कतार में
और बरसा जाता है मुझे
काव्यसरिता में छपाक

कोई तो है जो
सुगंधित कर जाता है,
मेरे प्राण की अणिमाओं को,
और ललचा जाता है,
प्रेरणाओं के नवबिम्ब

कोई तो है जो
सरका जाता है स्वप्न
मेरी नींदों के लिहाफ में,
और छितरा जाता है
मेरे तमस को

कोई तो है जो
छलका जाता है,
मधुकण मेरे नेत्रों के कोटरों में,
और तृप्ता जाता है,
मेरे रोम-रोम रमी प्यास को,

कोई तो है जो,
पहना जाता है
मेरी जिजीविषाओं को चेहरों के लबादे,
और छाप जाता है,
निश्चल निर्मल मासूम पतंगे

कोई तो है जो
सींच जाता है,
मेरी बंजर अभिलाषाओं को,
और अंकुरा जाता है,
मेरी तरूणाओं के बीजों को,

कोई तो है,
हाँ, हाँ,
कोई तो है....
*********
मैं
भीगे अखबार सा मैं,
पडा रहा, पडा ही रहा
पढे जाने की ललक लिये
लेकिन न उठाया किसी ने
हो आशंकित न हो जाऊं
तार-तार
प्रतीक्षा में नव किरणों को
सोख लेने की
लिये शब्दों के जखीरे
पडा रहा, पडा ही रहा
अपने में समेटे,
कुछ गुजरे कल, कुछ बहके पल
कुछ रेखाएं रंगीन, कुछ श्वेत औ श्याम
कुछ योजनाएं, कुछ घोषणाएं
कुछ शुभ कामनाएं, कुछ संवेदनाएं
समेटे हुए ऑंचल में अपने
पडा रहा, पडा ही रहा
भीगे अखबार सा मैं
*********



रे मानव
''रे मानव, निरे मानव,
मैंने ही कृता था, रचा था तुझे
बनाने को स्वर्ग, मृत्युशील जगत को,
मैंने ही बनाया वाहक तुझे
आनन्द का, दे सके जो
क्षणिक नेह, स्नेह
जीवन-मृत्यु के चक्र
में अटकी धरा को
किंतु तूने गढ डाले
मेरे ही कई रूप
भेजे थे मैंने कई हरकारे
जो लाए थे मेरा प्रेम सन्देश
तुने उन्हे भी बांट डाला
मजहबों के गुणा भाग में
मैं हूँ  शर्मसार
क्यों कि मैं ही तो हूँ
रचयिता तेरा''

फिर से ये अनुगूंज लगी
मुखरित होने
और इसकी प्रतिक्रिया में
हमने अपने
नगाडे, तुरहियों और
लाऊड स्पीकर्स के
वॉल्यूम को बढा दिया
अधिकतम सीमा तक
अधिकतम सीमा तक
****************


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13 Responses to संजय पुरोहित की तीन कविताएँ

  1. पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, अभी तो दिल्‍ली दूर है को ध्‍यान में रखते हुए निरंतर प्रयास जारी रखें। अब पाठकों की रुचि फास्‍ट फूड में रह गयी है, हाईकु, क्षणिकाऍं जल्‍दी आकर्षित करती हैं, लेकिन पारंपरिक रस नहीं छूटना चाहिये। अब आपकी पहली कविता को ही लें, इसमें कई क्षणिकाऍं छुपी हुई हैं।

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  2. SABHEE KAVITAYEN PADH KAR AANAND AA GAYAA HAI.
    SUNDAR AUR SAHAJ BHAVABHIVYAKTI KE LIYE BADHAAEE
    AUR SHUBH KAMNA.

    ReplyDelete
  3. संजय जी की कवितायेँ मन को बेहद संजीदा होकर लिखी गयी है |
    इन कविताओं से संजय जी की एक और छवि उभर कर आई है |
    इतनी अच्छी रचनाओं के लिए बधाई !

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  4. कोई तो है-कविता बहुत सुन्दर है !

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  5. बहुत बेहतरीन लगीं संजय पुरोहित जी की तीनों ही रचनाएँ...अनेक शुभकामनाएँ.

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  6. कविताओं को पढ़कर लगता है कि संजय पुरोहित अपने भीतर की दुनिया से क्षुब्ध हैं। इस क्षोभ को जुझारुता से जोड़ने की आवश्यकता है। इन कविताओं के बारे में मैं भाई तिलकराज कपूर जी के कमेंट्स से भी सहमत हूँ। सृजन से जुड़े रहने हेतु मेरी ओर से शुभकामनाएँ।

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  7. तीनो कविताएँ बेहद अच्छी लगी.
    regards

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  8. मन को बांध लेने वाली कविताएं है आपकी। यूं ही बेहतर लिखते रहे यही शुभकामना।

    ReplyDelete
  9. कुछ गुजरे कल, कुछ बहके पल
    कुछ रेखाएं रंगीन, कुछ श्वेत औ श्याम
    कुछ योजनाएं, कुछ घोषणाएं
    कुछ शुभ कामनाएं, कुछ संवेदनाएं
    समेटे हुए ऑंचल में अपने
    पडा रहा, पडा ही रहा
    भीगे अखबार सा मैं
    *********

    उमदा ख़यालात हैं
    मुबारकबाद

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  10. शानदार रचनाएँ हैं, खास तौर पर भीगे अखबार सा मैं, एक अलग अंदाज़ है!

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  11. ARE OH SAMBHA KITNE KAVITA HAI IS MAI
    SARDAR 3 , ARE WAH TEENO SHAANDAR , IS KO PADH KAR SARDAR KUSH HUA OR MOGAMBO BHI

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  12. sanjay ji, ab tak news me mike ki aawaz sahi nahi, gunjan se sunaideti hai.mere pass ek idea hai. plz contact.

    ReplyDelete

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