मोहम्मद इरशाद की पांच ग़ज़लें


मोहम्‍मद इरशाद
रचनाकार परिचय
नामः मोहम्मद इरशाद
जन्मः २१ जून, १९७१ (बीकानेर)
पिताः जनाब अजीज आजाद
प्रकाशनः दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक युगपक्ष, लोकमत, कादम्बिनी, विकल्प, संविद् समेत अनेक स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में १९९० से अनवरत गजल, गीत, कविता, व्यंग्य एवं नाटकों का प्रकाशन।
प्रसारणः सन् १९९० से आकाशवाणी, बीकानेर से रचनाओं का निरन्तर प्रसारण।
पुरस्कारः जवाहर कला केन्द्र, जयपुर की लघु नाट्य-लेखन प्रतियोगिता में नाटक जन्दगी के आसपासतथा उत्तरी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला द्वारा एक अन्य नाटक ज से जन्दगीपुरस्कृत।
विशेषः उर्दू शाइरी में जनाब हुसैन कलीम झुंझुनवी के शागिर्द।
सम्प्रतिः केन्द्रीय सेवा में।
सम्‍पर्क: मौहल्ला चूनगरान, बीकानेर (राज.)
**************************************************

१.
या रब तू मुझको ऐसा जीने का हुनर दे
जो मुझसे मिले इंसाँ उसे मेरा कर दे

नफरत बसी हुई है जिन लोगों के दिल में
परवर दिगार उनको मुहब्बत से भर दे

मैं खुद के ऐब देखूं ओर लोगों की खूबियाँ
अल्लाह जो दे तो मुझे ऐसी नजर दे

बेखौफ जी रहा हूं गुनहगार हो गया
दुनिया का नहीं दिल को मेरे अपना ही डर दे

जो लोग भटकते हैं दुनिया में दरबदर
मोती का ना सही उन्हें तिनकों का तो घर दे

हर हाल में करते हैं जो शुक्र अदा तेरा
इरशादको भी मौला तू बस ऐसा ही कर दे
२.
आदमी खुद से मिला हो तो गजल होती है
खुद से ही शिकवा-गिला हो तो गजल होती है

अपने जज्बात को लफ्जों में पिरोने वालों
डूब कर शेर कहा हो तो गजल होती है

गैर से मिलके जहाँ खुद को भूल जाय कोई
कभी ऐसा भी हुआ हो तो गजल होती है

दिल के ठहरे हुए खामोश समन्दर में कभी
कोई तूफान उठा हो तो गजल होती है

बेसबब याद कोई बैठे-बिठाए आए
लब पे मिलन की दुआ हो तो गजल होती है

सिर्फ आती है सदा दूर तलक कोई नहीं
उस तरफ कोई गया हो तो गजल होती है

देखो इरशादजरा गौर से सुनना उसको
गुनगुनाती सी हवा हो तो गजल होती है
३.
कुछ लोग जी रहे हैं वहमो-गुमान में
वो सोचते हैं हम ही हैं बस इस जहान में

जब वो नहीं तो अब इसे हम घर ही क्या कहें
दम घुटने लगा है मेरा खाली मकान में

अब देखते हैं उसका निशाना बनेगा कौन
बाकी है तीर आखरी उनकी कमान में

वो आसमाँ को छू के ही लौटेंगे अब तो बस
क्या हौंसला है देखिए नन्हीं सी जान में

औरों के वास्ते जो करते हैं बददुआ
रहता नहीं कोई असर उनकी जबान में

इरशाददिल का साफ है ये जानता हूं मैं
सौ ऐब होंगे माना यूँ तो उस नादान में
४.
हर पल की तुम बात न पूछो
कैसे गुजरी रात न पूछो

बाहर सब-कुछ सूखा-सूखा
अन्दर की बरसात न पूछो

जिसको सुन के पछताओगे
तुम मुझसे वो बात न पूछो

साहिल पे ही डूब गए वो
कैसे थे हालात न पूछो

दुनिया से तो जीत रहा हूँ
खुद से खुद की मात न पूछो

मिलता है इरशादसभी से
उससे उसकी जात न पूछो
५.
रखते थे इत्‍तेफाक जब उनके बयाँ से हम
अब क्या कहें बताईये अपनी जबाँ से हम

जिसमें कि बेवफाई का हरगिज न जक्र हो
उनको सुनाएं दास्ताँ ऐसी कहाँ से हम

चलते हैं इस जमीन पे नीची किये नजर
किरदार में बलन्द है इस आसमाँ से हम

वो लोग क्या गए कि दुनिया मचल गई
जाएँगे ऐसे देखना कभी इस जहाँ से हम

तुम दो कदम चले कि बस लडखडा गए
गुजरे हैं सौ-सौ बार ऐसे इम्तिहाँ से हम

इरशादसौ बरस न जीने की दे दुआ
पल की खबर नहीं जियें इतना कहाँ से हम
**************
- मोहम्‍मद इरशाद 

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21 Responses to मोहम्मद इरशाद की पांच ग़ज़लें

  1. सभी ग़ज़लें बेहतरीन लगीं. बधाई

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  2. वाह वाह ! क्या बात है! हर एक ग़ज़ल लाजवाब है!

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  3. इन ग़ज़लों में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

    ReplyDelete
  4. marhum janb azeez azad sahib mere bahut achhe mitra thai.aaj unke saputra ki gazhalen mere samne hain.pehle to bada ajeeb laga.mohmmad irshad ke sath unka name dekh kar chounka bhi.fir gazhal padh kar aashwast hua ke mere azeez dost azeez sahib ke sahib jade hi hain. bahut achhi gazhal likhi mohammad irshad.apne abbajan ke naksh-e-kadam par ho!aage badho tumhari manzil bahut aage hai.
    badhai or aashish!

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  5. mohammad irshad jaise shairon ko prakash me lane ke liye aakhar kalash or sampadak mandal ko sadhuwad!

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  6. एक से बढकर एक गज़लें. लेकिन जो शेर मुझे बहुत अच्छे लगे
    जिसको सुन के पछताओगे
    तुम मुझसे वो बात न पूछो
    और-
    दुनिया से तो जीत रहा हूँ
    खुद से खुद की मात न पूछो
    बधाई.

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  7. ACHCHHEE GAZALON KE LIYE MEREE BADHAAEE AUR
    SHUBH KAMNAAYEN

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  8. बाहर सब-कुछ सूखा-सूखा
    अन्दर की बरसात न पूछो

    वाह ..वाह...सभी ग़ज़लें बेहतरीन हैं...लाजवाब...शुक्रिया इरशाद भाई की शायरी से रूबरू करवाने के लिए.
    नीरज

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  9. मुकम्मल इरशाद...

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  10. बीकानेर में उर्दू अदब के कई बडे नाम बुलंदियों को छू रहे हैं लेकिन बीकानेर की तहजीब को विरासत में पाने वाले इरशाद एक अलग मिजाज के साथ अपनी गजलों में नूर सजा कर लाते हैं इरशाद एक आशा जगाने वाले शाईर हैं, उनकी गजलों में संवेदना उत्‍कर्ष पर नजर आती है तो हर पंक्ति अपने आप में मुक्म्मिल दायरा लिये पाठक को गहरे तक सोचने को विवश करतीं है,नेट की दुनियां में अपनी नयी खुश्‍बू के साथ तशरीफ लाए शाईर का स्‍वागत है, गजलें सभी से बढकर एक हैं, बधाई इरशाद को और शुभकामनाएं ये कि आप जब भी गजल कहे, तो लोग कहें, कहते रहे इरशाद इरशाद इरशाद

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  11. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 17.04.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  12. भाई इरशाद, आपकी गज़लों में जीवन घडक़ता है। जिन्दगी के तजुर्बात को आपने शब्दों की शक्ल में बखूबी बयान किया है।
    -संजय आचार्य ‘वरूण’

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  13. SAARI GAJLEIN LAJAWAB IRSHAAD SAHAB APNE TEWAR KE EK ALAG SHATR HAI.AAPNE SAADA JUBAN BEHTRIN KALAAM KAHA HAI MUBARAK HO

    ReplyDelete
  14. Dear Bhai IRSHAD,

    apne vaalid Aziz Saheb ki jis virasat ko aap itni khubsurati k sath aage badha rahe hain, ye mehsoos kar k bahut acha lag raha hai. aap jaise yuva shayar ko padhkar bahut prerna milti hai or kuch acha likhne ka hamara bhi honsala badhne lagta hai. aap aage bhi hame yun hi apni ghazlo se sukun bhare ehsaso se do-char hone ka moka denge isi subhkamnao k sath..

    :)

    ReplyDelete
  15. वाह वाह ! क्या बात है! हर एक ग़ज़ल लाजवाब है!

    ReplyDelete
  16. फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का जी की इस नज्म से कुछ बयाँ करता हूँ ... जो ख्याल आया मन में इरशाद साहब जी की ग़ज़ले पड़ कर

    तीसरा पहर कहता है-
    मैं छाया के लिए प्यासा हूँ
    चांद कहता है-
    मुझे तारों की प्यास है
    बिल्लौर की तरह साफ़ झरना होंठ मांगता है
    और हवा चाहती है आहें

    मैं प्यासा हूँ ख़ुशबू और हँसी का
    मैं प्यासा हूँ चन्द्रमाओं, कुमुदनियों और झुर्रीदार मुहब्बतों से मुक्त
    गीतों का

    कल का एक ऎसा गीत
    जो भविष्य के शान्त जलों में हलचल मचा दे
    और उसकी लहरों और कीचड़ को
    आशा से भर दे

    एक दमकता, इस्पात जैसा ढला गीत
    विचार से समृद्ध
    पछतावे और पीड़ा से अम्लान
    उड़ान भरे सपनों से बेदाग़
    एक गीत जो चीज़ों की आत्मा तक
    पहुँचता हो
    हवाओं की आत्मा तक
    एक गीत जो अन्त में अनन्त, दय के
    आनन्द में विश्राम करता हो !


    ग़ज़लें बहुत ही अछी लगी ...

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  17. aap tamam sukhan feham hazrat ne meri gazlon ko pasand ki uske liye aap ka bahut bahut shukariya
    our isi tarha aap ki muhabat milti rarhegi

    ReplyDelete
  18. aakhar kalash par ek baar fhir aane ki khawhish hai narendar i

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  19. ek bar or aakhar kalash pe aane ki hasrat hai narendar ji

    ReplyDelete

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