डॉ. मदन गोपाल लड्ढा की कविताएँ















मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं

भाषा
खेत के रास्ते
मैंने सुनीं
ग्वाले के बांसुरी

बांसुरी से याद आई
कान्हा की बांसुरी

बांसुरी की भाषा को
मान्यता की नहीं जरूरत
राग-रंग, हर्ष और दुख की
होती सदैव एक ही भाषा.

बच्चे भगवान होते हैं!

बच्चा अनजान होता है
रीत-कायदा
कब जाने!

बच्चा नासमझ होता हैं
दुनियादारी
क्या समझे!

बच्चे नादान होते हैं!
बच्चे भगवान होते हैं

मन्नत
मैंने मांगा
सांवरे से
केवल और केवल
तुमको
तुम्हारे बहाने
सांवरे ने
सौंप दी मुझे
सारी दुनिया
सचमुच
अब मुझे
तुम्हारी तरह
अच्छी लगती है
यह दुनिया.

पाठशाला
तीस वर्ष पुरानी
दीवारें भी
पढी-लिखी है यहां
कान पक गए
अ अनार
आ आम की टेर सुनते
सातवें सुर में
वर्णमाला का बोलना
मंत्रों से करता है होड़.
यह पाठशाला
कैसे कम है
किसी मंदिर से ?

मेरा घर
दीवार से सटाकर रक्खी है
पुरानी चारपाई
झूले खाती मेज पर
लगा है किताबों का ढ़ेर
दीवारों पर लटक रहे हैं
नए-पुराने कलैंडर
आले में पड़ा है रेडियो
खूंटियो पर टंगे है कपड़े.

परंतु
आठ बाई दस फ़ुट का
मेरा यह कमरा
साधारण तो नहीं है
ब्रह्मा होने की
मेरी ख्वाहिशों का
साखी है.

इसकी आबो-हवा में
पसरी हुई है
कई अनलिखी
कालजयी कविताएं
जो मुझे तलाश रही हैं.
**************
अनुवाद- स्वयं कवि द्वारा
संपर्क-१४४, लढ़ा निवास, महाजन, बीकानेर, राजस्थान (भारत)
madanrajasthani@gmail.com



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12 Responses to डॉ. मदन गोपाल लड्ढा की कविताएँ

  1. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  2. बहुत सुंदर ,विशेषतया ’पाठशाला’ बहुत उम्दा ,सच पाठशाला किसी मंदिर से कम नहीं होती

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  3. भाई जुगलजोड़ी जी,
    नमो है थानै अर थारै ब्लाग नै!
    20रै ऐड़ गेड़ टीप भेज दी पण लागै पूगी एक ई कोनी का फेर थारी कूटळै आळी छाबड़ती मेँ गई परी।लूंठी दीखै थां आळी कूटळा छाबड़ती?

    ReplyDelete
  4. थारी शानदार अर ज्यानदार राजस्थानी कवितावां रो उल्थो बांच,र जीव सोरो होयो!कई बार टीप भेजी पण ब्लागड़ै आळी जुगलजोड़ी कोई भिचकी घाल दी।खैर! बधाई!

    ReplyDelete
  5. Bacche Bhagwan hote hain....Jaisi Man ko choo lene wali kavitaon ke liye chote bhaee Dr.Madan Laddha ka abhar. Deendayal Sharma

    ReplyDelete
  6. मुझे 'आखर कलश' का अम्बेसडर नियुक्त कर दो!
    *सुझाव/निवेदन/आग्रह:-
    1.रचनाओँ के चयन हेतु एक टीम गठित करेँ।
    2 .हर राज्य व ज़िलोँ मे अपने प्रतिनिधि बनाओ जिनके माध्यम से चयनित व बेहतरीन रचनाएं आएं।
    3.संक्षिप्त पुस्तक समीक्षा भी देँ। प्रेषित समीक्षा न प्रकाशित करेँ बल्कि अपने स्तर पर समीक्षा करवाएं। इष हेतु पुस्तक की दो प्रति मंगवाएं।एक प्रति आती है तो पुस्तक का विवरण फोटो सहित प्रकाशित करेँ
    4.रचनाकारोँ का आडियो/वीडियो भी लगाएं
    5 .रचनाओँ के साथ रेखा चित्र/पेँटिँग/कोलाज/फोटो भी लगाएं।इस से रचनाओँ की संवेदनाएं अधिक मुखरित होंगी साथ ही चित्रकारोँ को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
    *KAGAD

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  7. इसकी आबो-हवा में
    पसरी हुई है
    कई अनलिखी
    कालजयी कविताएं
    जो मुझे तलाश रही हैं.

    prabhavshali panktiyaan .....!!

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  8. सुबै 6 बज्यां लाग्यो हो सेँडण नै।ताबै ई नी आवै ही।छेकड़ म्हारी ई तकनीकी गळती लाधी पण ओळमो थां माथै धर दियो।अब ओळमो खत्म ! म्हैँ तो राजी हूं अर थां नै कर लेस्यूं।भलो-क!

    ReplyDelete
  9. Bhai Madan gopal ladha ji.
    NAMESKAR
    Aap ki mulyam si Dil se likhi kavitaye pdhi.bhut hi payri si legi.mannet, pathshala.or ghar.teeno kavityo mai bhut hi achha proyeg h.kavita woh hi achhi legti jo Aam pathek k liye likhi jaye.Aap n saral or shej rachana di h.khubsurat or mithi kavita k liye Aap ko sadhui-bad.
    NARESH MEHAN

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  10. राजस्थानी से हिंदी में सुंदर अनुवाद के लिए बधाई ।

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  11. sundar rachanaae, hardik bdhai
    rajuram sharma

    ReplyDelete
  12. नमस्‍कार गूस्रूजी आपकी कविताऐं अतिव सून्‍दर एवं र‍मणीय हैंा
    मूझे आपका आखर कलश बहूत अच्‍छा लगा
    इसके लिए मेरे और मेरे परिवार की तरुफ से हार्दिक धन्‍यवाद

    ReplyDelete

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