अरुणा राय की कवितायें












शामतें:
१)अदृश्य परदे के पीछे से
दर्ज कराती जाती हूँ मै
अपनी शामतें
जो आती रहती हैं बारहा
अक्सर उन शामतों की शक्लें होती हैं
अंतिरंजित मिठास से सनी
इन शक्लों की शुरूआत
अक्सर कवित्वपूर्ण होती है
और अभिभूत हो जाती हूँ मै
कि अभी भी करूणा,स्नेह,वात्सल्य से
खाली नहीं हुयी है दुनिया
खाली नहीं हुयी है वह
सो हुलसकर गले मिलती हूँ मै
पर मिलते ही बोध होता है
कि गले पडना चाहती हैं वे शक्ले
कि यही रिवाज है परंपरा है

कि जिसने मेरे शौर्य और साहस को
सलाम भेजा था
वह कॉपीराइट चाहता है
अपनी सहृदयता का , न्यायप्रियता का
उस उल्लास का
जिससे मुझे हुलसाया था
और ठमक जाती हूँ मै
सोचती हुयी

क्या चेहरे की चमक
मेरे निगाहों की निर्दोषिता
काफी नहीं जीने के लिए
सोच ही रही होती हूँ कि
फैसला आ जाता है परमपिताओं का
और चीख उठती हूँ -
हे परमपुरूषों बख्शों.....,अब मुझे बख्शों।

२)जीवन
अभी चलेगा
धूल-धुएं के गुबार...
और भीडभरी सडक..
के शोर-शराबे के बीच/
जब चार हथेलियां
मिलीं/
और दो जोड़ी आंखें
चमकीं
तो पेड़ के पीछे से
छुपकर झांकता/
सोलहवीं का चांद
अवाक रह गया/
और तारों की टिमटिमाती रौशनियां
फुसफुसायीं
कि सारी जद्दोजहद के बीच
जीवन
अभी चलेगा !
                     
अगले मौसमों के लिए
3)अगले मौसमों के लिए
सार्वजनिक तौर पर
कम ही मिलते हम
भाषा के एक छोर पर
बहुत कम बोलते हुए
अक्सर
बगलें झाँकते
भाषा के तंतुओं से
एक दूसरे को टटोलते
दूरी का व्यवहार दिखाते
क्षण भर को छूते नोंक भर
एक-दूसरे को और
पा जाते संपूर्ण

हमारे उसके बीच समय
एक समुद्र-सा होता
असंभव दूरियों के
स्वप्निल क्षणों में जिसे
उड़ते बादलों से
पार कर जाते हम
धीरे धीरे
अगले मौसमों के लिए
अलविदा कहते हुए 


यह प्यार 
4)आखिर क्यों है यह प्यार
कितना भयानक है प्यार
हमें असहाय और अकेला बनाता
हमारे हृदय पटों को खोलता
बेशुमार दुनियावी हमलों के मुकाबिल
खड़ा कर देता हुआ निहत्था
कि आपके अंतर में प्रवेश कर
उथल पुथल मचा दे कोई भी अनजाना
और एक निकम्मे प्रतिरोध के बाद
चूक जाएं आप
कि आप ही की तरह का एक मानुष
महामानव बनने को हो आता
आपको विराट बनाता हुआ
वह आपसे कुछ मांगता नहीं
पर आप हो आते तत्पर सबकुछ देने को उसे
दुहराते कुछ आदिम व्यवहार
मसलन ...
आलिंगन
चुंबन
सित्कार


बंधक बनाते एक दूसरे को
डूबते चले जाते
एक धुधलके में
हंसते या रोते हुए
दुहराते
कि नहीं मरता है प्यार
कल्पना से यथार्थ में आता
प्यार
दिलो दिमाग को
त्रस्त करता
अंततः जकड लेता है
आत्मा को
और खुद को मारते हुए
उस अकाट्य से दर्द को
अमर कर जाते हैं हम... 

 
५)  हाथ में लेकर तुम्‍हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
आत्‍मा तक पैसरने का द्वार है यह भी
आंख की तो
साख है यूं ही
पर हृदय का द्वार
खुलता है हथेली से
हाथ में लेकर तुम्‍हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
कैसे उमगते हैं परस्‍पर
स्‍नेह के अंकुर
मानस पटल पर
झरते कैसे पुष्‍प पारिजात के
और खुशबू पसरती है
किस तरह निज व्‍योम में
हाथ में लेकर तुम्‍हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
जागरण और स्‍वप्‍न की
संधि कहां है
किस तरह मनुहार करती हैं
परस्‍पर अंगुलियां
थमता है कहां पे जाकर
ज्‍वार अपने स्‍नेह का
हाथ में लेकर तुम्‍हारा हाथ 

*******
- अरुणा  राय

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9 Responses to अरुणा राय की कवितायें

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

    ReplyDelete
  4. बेहतर कविताएं...

    ReplyDelete
  5. अरुणा राय जी की कवितायेँ विशेष रूप से --जीवन तथा -यह प्यार बहुत अच्छी कवितायेँ हैं बधाई.

    ReplyDelete
  6. SABAD SAMNJSAY BAHU HI SUNDER W SARTHAK. BADHAI.

    ReplyDelete
  7. नमस्कार अरुणा जी
    बेहद अच्छा सामंजस्य किया है प्रेम और आत्मा का और सांसारिकता और वैदिकता का
    बिलकुल सही है जो ह्रदय का द्वार हथेली है तभी तो विवाह का महत्वपूर्ण अंग है पाणिग्रहण संस्कार
    एक अन्य रचना में प्रेम के प्रति आपका जो नजरिया है वो ठीक मेरी सोच से मिलता है शानदार और प्रेम मयी प्रस्तुति
    प्रेम बांधता है दिलो को वो भी सारी सीमाओं को तोड़कर ऐसा बंधन मन मोहन है
    भगवन करे आप जैसी सोच सबकी हो

    ReplyDelete

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