दो गज़लें-- प्राण शर्मा















आपको रोका है कब मेरे  जनाब 
शौक़  से पढिये मेरे दिल की किताब 
बात सोने पर सुहागा सी    लगे 
सादगी के साथ हो कुछ तो  हिजाब 
छोड़ अब दिन-रात का गुस्सा  सभी 
कम  पड़ जाए तेरे चेहरे की  आब 
वास्ता  सुख से भी पड़ता है जरूर 
कौन रखता है मगर इनका   हिसाब 
धुंध पस्ती की हटे  तो बात     हो 
कुछ नज़र आयें  दिलों के   आफताब 
रोज़  ही इक ख्वाब से आये  हैं तंग 
" प्राण" परियों  वाला   हो कोई तो ख्वाब 

**************
भले ही सुनहरा किसी का हो यौवन 
किसे याद आता नहीं अपना   बचपन 
कभी सोच प्यारी तुम्हारी  हो   प्यारे 
कि संदल से बढ़ कर लगेगा तुम्हें  मन 
मुहब्बत नहीं है तो कुछ भी नहीं है
सभी टूट जाते हैं इंसानी     बंधन
मुझे मान इतना जो तुम दे रहे  हो
मेरे दोस्त ,ये है तुम्हारा    बड़प्पन
भले ही प्यारी लगे   सारी  दुनिया
किसे प्यारा लगता नहीं अपना  जीवन
जरा  आने दो " प्राण" मधुमास को तुम
हरा ही हरा होगा उपवन का उपवन
**************
- प्राण शर्मा , यू.के 

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8 Responses to दो गज़लें-- प्राण शर्मा

  1. सुनील जी, आदाब
    आदरणीय प्राण साहब का हर शेर दुआओं से कम नहीं है
    ये शेर कितना कुछ कह रहे हैं-
    ‌‌‌‌‌‌‍>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
    धुंध पस्ती की हटे तो बात हो
    कुछ नज़र आयें दिलों के आफताब
    <<<<<<<<<<<<<<<<<<
    भले ही न प्यारी लगे सारी दुनिया
    किसे प्यारा लगता नहीं अपना जीवन
    .......
    प्राण साहब.....सलाम कबूल फ़रमायें

    ReplyDelete
  2. इन ग़ज़लों को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा।

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  3. प्राण शर्मा जी की दोनों ग़ज़लें दिल को छूने वाली हैं. प्राण शर्मा जी
    ग़ज़ल के उस्ताद हैं, कितने ही अच्छे शायर इन से ग़ज़ल विधा
    सीख कर की अनेक पत्रिकाओं में और मुशायरों में नाम पैदा कर रहे हैं.
    ये दोनों अशआर बहुत पसंद आये:
    वास्ता सुख से भी पड़ता है जरूर
    कौन रखता है मगर इनका हिसाब
    मुहब्बत नहीं है तो कुछ भी नहीं है
    सभी जाते हैं इंसानी बंधन
    सुनील जी, प्राण जी की ग़ज़लें पढ़वाने के लिए धन्यवाद.
    महवीर शर्मा

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  4. प्राण साहब के इन शे'रों पर क्या कहें.

    खुशबु फैलती सी लगी

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  5. भले ही सुनहरा किसी का हो यौवन
    किसे याद आता नहीं अपना बचपन

    प्राण साहब ; आपने बचपन का ज़िक्र कर मेरे पसंदीदा विषय को याद दिला दिया और मैं बचपन की मीठी यादों में खो गया. बहुत ही खूब लिखा है आपने. सादर नमन

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  6. "आपको रोका है कब मेरे जनाब /शौक़ से पढिये मेरे दिल की किताब"- अपने दिल को खोलकर सामने रखना यानिकि सच-सच कह देना बहुत बड़ी बात है. बहुत अच्छी रचना. बधाई स्वीकारें. अवनीश सिंह चौहान.

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  7. Pahli Ghazal la matla bahut hi khoobsoorat bana hai..baqi har sher mein Pran ji ne jaan phoonk di hai. Apne arth se ve sajeev ban padte hain.

    ReplyDelete

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