रवि पुरोहित की कविताएँ













बिखरे पत्तों ने कहा था

कृपाण-सी सरसराती
पुरवाई
बींध कर चली गई
अन्तर्मन को/
चीरती-सी बह गई
पले-अधपले
दूध-मुंहे बच्चों को

लाशों के से ढेर लग गये
टहनियों को छूते-से !

बूढाता वृक्ष
झूलता रहा
यंत्र-चलित-सा,
निर्मोही-सन्यासी बन !

समेटता रहा
बिखरती सांसें,
उलीचता रहा-
अनुभवों का अहम/
अपनी ही रौ में
तन्मयता से !
आस-पास के वृक्षों तले
बिखरे पत्ते
हो गये एकत्रित
पुरवाई के फ़टकारे से

-आओ !
हम लटक जायें
टूटे पत्तों की जगह
डाल पर/
करें
एक नई दुनियां का सृजन
अपने बलबूते पर....!

बिखरे पत्तों ने कहा
और लगे मचलने
क्रियान्वयन की उत्सुकता से !

देखा -
पुरवाई थम चुकी थी !

****
 
उस दिन को जीने कि चाहत

भूख से
रोटी से
सूखे से
अतिवृष्टि से
काम से
निष्काम से
चलने से
बैठने से
हंसने से
रोने से
मौन से
बातों के बवंडर से
सब कुछ से
आखिर
ऊबता-थकता है आदमी,
नहीं थकता
तो सिर्फ़ स्वार्थ के विचार से
या फ़िर
अर्थ की भूख से,
कब मन भरेगा मानव का
इन सब से,
मै
उस दिन को जीने की चाहत में
रोज मरता हूं,
रोज जीता हूं !

****

अमरबेल

बिन खाये-पिये
वह खटती रही
दिन चढे तक
अविरल-अविराम...

झाडू-पौंचा,
चौका-बासा
सब कुछ सम्भाला उसने
और अनुभवों की तरजीह से
सलीका बिछाया
बाहरी दरवाजे की चौखट तक !

पसीना
चूता रहा टप-टप,
भिगोता रहा
फटी कांचली,
उनिंदी आंखें
करती रही शिकायत !

भूख-प्यास
जताती रही विरोध
पर शिकन भी न उभरी
दादी के चेहरे पर !

सर्वांग रोमांचित था
दादी का,
भीतर की मां
देखती रही
पौत्रवधु का स्नेहिल चरण-स्पर्श,
उतारती रही बलाएं
नजर की,
कि बहू ने दादी को
अन्दर जाने को चेताया !

मांगलिक कार्य में
विधवा की प्रत्यक्ष उपस्थिति
अशुभ जो होती !

अमरलता की तरुणाई
छिन गई पल में,
कट गई डाल
साख थी जो नहीं
****

अंत

गाल फुला कर
उङाता रहा
धुंआं
गोल-गप्पों की सूरत में
बांट-बांट कर जिंदगी-भर

किंतु
नहीं थका
उसका पौरुष

देखा-
टब की जिन्दगी रीत चुकी थी !

****

चेहरे

किस्मत के नायाब कारीगर
रोज बनाते हैं चेहरे,
प्यार जता कर, धमकी देकर
रोज रुलाते हैं चेहरे !

चेहरों की आबाद बस्तियां
तुड़े-मुड़े-फ़टे  चेहरे,
मुझसे मेरा राज जान कर
रोज नचाते हैं चेहरे !

दीन-हीन याचक-से लगते
करुण विलापित-से  चेहरे,
चेहरों की ही भीड़ में खो कर
रोज ढूंढते हैं चेहरे !

लोप हुई पहचान उनकी
पढे अखबार-से चटे  चेहरे,
वे, वे नहीं हैं जो वे हैं
हैं रोज बताते बिके चेहरे !

सच समय का है यही अब
भरे-भरे खाली  चेहरे,
सब जानते हैं आज रवि
क्यों नींद उड़ाते हैं  चेहरे !
**

परम्परा

पगडण्डी से निकली
एक और पगडण्डी
और थौड़ी दूर चल कर
मिल गई
आम रास्ते में !

लोगों ने कहा -
समझदार थी बेचारी !
***

आंखें : परिणति

आंखें
पहचानती है अब
समय की
धड़कन,

देखती है
लौकिक अटकलें,
टपकाती है
सिर्फ़
सिंदूरी खून......

आंसू
सूख जो गये हैं 
व्यवस्थाओं के वशीभूत !
***

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8 Responses to रवि पुरोहित की कविताएँ

  1. bahut hi gahan abhivyakti.........ati uttam.

    ReplyDelete
  2. Ravi Purohit ki kavita "Us din ko jeene ki chahat" bahut hi acchi lgi.Isme aaj ke adami ki jeewancharya ka jeewant chitran kiya hai. aakharkalash ki teem aur kavi Ravi Purohit ko badhee. Deendayal sharma, http://deendayalsharma.blogspot.com

    ReplyDelete
  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. सभी रचनाएं बहुत हृदयस्पर्शी हैं।

    ReplyDelete
  5. देखा -
    पुरवाई थम चुकी थी !
    -----------------
    नहीं थकता
    तो सिर्फ़ स्वार्थ के विचार से
    या फ़िर
    अर्थ की भूख से
    ----------------
    अमरलता की तरुणाई
    छिन गई पल में,
    कट गई डाल
    साख थी जो नहीं
    --------------------
    पगडण्डी से निकली
    एक और पगडण्डी
    और थौड़ी दूर चल कर
    मिल गई
    आम रास्ते में !
    -----------------

    ...आपने तो इत्ती सारी कविता एक साथ लिख दी! एक-एक पर कमेन्ट करने में घंटों लग सकते हैं. मैंने भी शार्ट-कट रास्ता अपनाया जो पंक्ति अच्छी लगी उसे कट पेस्ट कर दिया.
    ...सभी कविताएँ अच्छी हैं लेकिन मुझे सबसे अधिक 'परम्परा' कविता ने प्रभावित किया...इसमें तो जीवन दर्शन ही छुपा है.
    ..आभार.

    ReplyDelete
  6. -आओ !
    हम लटक जायें
    टूटे पत्तों की जगह
    डाल पर/
    करें
    एक नई दुनियां का सृजन
    अपने बलबूते पर!

    वाह भाई रवि जी
    बेहतरीन कविताओं के लिये हार्दिक बधाई

    मदन गोपाल लढ़ा

    ReplyDelete

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