कवि कुलवंत सिंह की कविताएँ














प्रभात

जाग जाग है प्रात हुई,
सकुची, लिपटी, शरमाई ।


अष्ट अश्व रथ हो सवार
रक्तिम छटा प्राची निखार
अरुण उदय ले अनुपम आभा
किरण ज्योति दस दिशा बिखार ।


सृष्टि ले रही अंगड़ाई,
जाग जाग है प्रात हुई ।


कण - कण में जीवन स्पंदन
दिव्य रश्मियों से आलिंगन
सुखद अरुणिम ऊषा अनुराग
भर रही मधु, मंगल चेतन


मधुर रागिनी सजी हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।


अंशु-प्रभा पा द्रुम दल दर्पित
धरती अंचल रंजित शोभित
भृंग - दल गुंजन कुसुम - वृंद
पादप, पर्ण, प्रसून, प्रफुल्लित ।


उनींदी आँखे अलसाई
जाग जाग है प्रात हुई ।


रमणीय भव्य सुंदर गान
प्रकृति ने छेड़ी मद्धिम तान
शीतल झरनों सा संगीत
बिखरते सुर अलौकिक भान ।


छोड़ो तंद्रा प्रात हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।


उषा धूप से दूब पिरोती
ओस की बूंदों को संजोती
मद्धम बहती शीतल बयार
विहग चहकना मन भिगोती ।
देख धरा है जाग गई
जाग जाग है प्रात हुई ।

*******

प्रणय गीत

गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।


.शीतल अनिल अनल दहकाती,
सोम कौमुदी मन बहकाती,
रति यामिनी बीती जाती,
प्राण प्रणय आ सेज सजा दो ।
गीत प्रणय का अधर सजा दो ।


.गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।


.ताल नलिन छटा बिखराती,
कुंतल लट बिखरी जाती,
गुंजन मधुप विषाद बढाती,
प्रिय वनिता आभास दिला दो ।
गीत प्रणय का अधर सजा दो ।


.गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।


.नंदन कानन कुसुम मधुर गंध,
तारक संग शशि नभ मलंद,
अनुराग मृदुल शिथिल अंग,
रोम रोम मद पान करा दो ।
गीत प्रणय का अधर सजा दो ।


.गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।

*******

झंकृत

झन - झन झंकृत हृदय आज है
वपु में बजते सभी साज हैं ।
पी आने का मिला भास है
मिटेगा चिर विछोह त्रास है ।


मंद - मंद मादक बयार है
खिल प्रकृति ने किया शृंगार है ।
आनन सरोज अति विलास है
कानन कुसुम मधु उल्लास है ।


अंग - अंग आतप शुमार है
देह नही उर कि पुकार है ।
दंभ, मान, धन सब विकार है
प्रेम ही जीवन आधार है ।


रोम - रोम रस, रुधित राग है
मिला जो तेरा अनुराग है ।
मन सुरभित, तन नित निखार है
नभ - मुक्त, तल नव विस्तार है ।


घन - घन घोर घटा अपार है
संग तुम मेरा अभिसार है ।
अनंत चेतना का निधान है
मिलन हमारा प्रभु विधान है ।

*******

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3 Responses to कवि कुलवंत सिंह की कविताएँ

  1. जाग जाग है प्रात हुई,
    सकुची, लिपटी, शरमाई ।


    अष्ट अश्व रथ हो सवार
    रक्तिम छटा प्राची निखार
    अरुण उदय ले अनुपम आभा
    किरण ज्योति दस दिशा बिखार ।


    सृष्टि ले रही अंगड़ाई,गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
    स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।


    .शीतल अनिल अनल दहकाती,
    सोम कौमुदी मन बहकाती,
    रति यामिनी बीती जाती,
    प्राण प्रणय आ सेज सजा दो ।
    गीत प्रणय का अधर सजा दो
    ek se badhkar rachna man ko jaise thandi hawa chhoo gayi .sukoon mila padhkar

    ReplyDelete

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